मतदान करने की बाध्यता पर कानून बने

लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए यह आवश्यक है कि लोगों में अपने मतों का प्रयोग करने की जिज्ञासा और जागरूकता हो। जागरूक व्यक्ति ही अपने मतों के महत्व को समझ सकता है। कानून जागरूक लोगों को बिना किसी प्रेरणा, प्रचार, उत्साह वर्धन, डर, लालच, वर्चुअल एवं भौतिक रैलियों, डोर टू डोर कैंपेन, सामूहिक झुंड के माध्यम से प्रचार, राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों द्वारा किया जा रहा प्रचार, लोकगीतों के माध्यम से किये जा रहे प्रचार की कोई आवश्यकता नहीं रहेगी और यह अपने आप धराशायी हो जाएगा। इस व्यवस्था से वोट प्रपंच की सारी बाधाएं भी समाप्त हो जाएगी। कानून की मर्यादा मनुष्य को सिर्फ जागरूक ही नहीं बनाती है बल्कि अच्छे- बुरे का निर्णय लेने के बिंदु पर सही समय में एक प्रभावशाली हथौड़े सा काम करती है जो लोगों को पथभ्रष्ट होने अथवा अपने उद्देश्य के राह से भटकने की स्थिति के रास्ते को भी कुंठ भी करता है। जब कानूनी बाध्यता रहती है तो लोग कानून भीरू होकर अपने दायित्वों के निर्वहन में अपनी सोच व्यापक करते हुए उस कार्य को करने में अपनी मजबूरी या आवश्यकता समझते हैं और धीरे-धीरे उस कार्य में निपुण हो जाते हैं। इसके लिए राजनीतिक दलों के कोटरी के लोगों के उत्साह वर्धन की आवश्यकता नहीं पड़ती है और ना ही बड़े-बड़े माईकों से प्रचार, रैलियों, डोर टू डोर कैंपेन की तैयारी कर एक बड़ी राशि को खर्च करने की आवश्यकता पड़ती है ताकि अभ्यर्थी लोगों को अपने हिसाब से, अपने पक्ष में, अपने हित के लिए लोगों को वोट देने के लिए प्रभावित कर सके।
भारत एक विशाल देश है। यहां चुनावों में हो रहे अप्रत्याशित खर्चे अपने ही राष्ट्र की आर्थिक गतिविधियों को कुंद करने वाला षड्यंत्र सा लगता है। इस बदचलन खर्चों को सामाजिक उत्थान के कार्यों में लगाकर समाज के वंचित वर्ग के लोगों के लिए बड़े-बड़े विद्यालय, महाविद्यालय, विश्वविद्यालय, कोचिंग संस्थान, हेल्थ सेंटर, पुस्तकालय, वाचनालय, सांस्कृतिक केंद्र, कौशल विकास केंद्र, प्रशिक्षण केंद्र, बड़े-बड़े योगपीठ का निर्माण किया जा सकता है। सरकार के इस प्रयास से हम भारत को एक वैभव, समृद्ध, उन्मुक्त, विकसित भारत, शिक्षित भारत, गरिमामय भारत, संस्कृति के सागर से पूर्ण भारत, लोकाचार संस्कारों से पूर्ण भारत, पारिवारिक समृद्धि से पूर्ण भारत, संतुलित भारत एवं अनुशासित भारत बना सकते हैं। यह इस देश के लिए आवश्यक ही नहीं अपरिहार्य है। ऐसा प्राय: देखा जा रहा है कि चुनाव हो या उपचुनाव, चुनाव आयोग द्वारा भी अधिक से अधिक मतदान की अपेक्षा मतदाताओं से की जाती है एवं लोगों में जागरूकता के आदेशों की सीख देने के लिए मुख्य चुनाव आयुक्त द्वारा बड़े-बड़े अभिनव प्रयास भी प्रारंभ किए जाते हैं। जैसे लोकगीतों के माध्यम से सिलेब्रिटीज़ के माध्यम से, समाज के आइकॉन के माध्यम से एवं समाज के उच्चकोटि के बुद्धिजीवियों के माध्यम से, मतदान करने के लिए लोगों को जागरूक किया जाता है। यह ऐसा प्रयास क्यों? इसकी जरूरत क्यों? यह भी एक यक्ष प्रश्न है, जिसका जवाब भारत मांगता है। क्या इसमें खर्च नहीं होगी? क्या यूं ही सिलेब्रिटीज़ के द्वारा लोकगीतों के माध्यम से जगह-जगह प्रचार करने के लिए वह जाएंगे? क्या उन्हें उनका मेहनताना नहीं चाहिए? क्या उन्हें अपने कार्य का प्रतिफल नहीं चाहिए? इसका उत्तर “हां” में निकलता है, जरूर, इन्हें जरूर चाहिए, यह सही भी है। इस प्रकार यह राशि सरकार के खर्चे को ही बढ़ाती है जो लोकतंत्र में रहने वाले लोगों की गाढ़ी कमाई है। इसका उपयोग राष्ट्रहित में होना चाहिए ना कि इन अनाप-शनाप खर्चों में। सरकर से यह अपेक्षा की जाती है कि वे राष्ट्रहित में एक कानून बनाए जिस कानून में वोट डालने वाले मतदाताओं को यह स्पष्ट निर्देश रहे कि उन्हें अपने क्षेत्र के प्रतिनिधि के चुनाव में भाग लेना अनिवार्य है, नहीं तो…….? इस व्यवस्था से सरकारी तंत्रों का दुरुपयोग तो रुकेगा ही साथ ही साथ गलत खर्चे भी रुकेंगे, प्रचार-प्रसार में हो रहे बेईमानी, खर्चे पर नियंत्रण होगा एवं बिना किसी रैली, जलशे या जागरूकता अभियान के माध्यम से लोगों को प्रेरित करने के उद्यमी उपक्रम पर भी किसी तरह के खर्चे की कोई आवश्यकता नहीं रहेगी एवं स्वस्थ एवं स्वच्छ तरीके से लोक प्रतिनिधियों के चुनाव में हो रहे खर्चे समाप्त हो जाएंगे। इन राशियों का इस्तेमाल वैभव एवं समृद्ध भारत बनाने के लिए किया जा सकेगा।

लेखक- डॉ0 अशोक, पटना

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