उद्देश्य विहीन संयुक्त राष्ट्र

135 करोड़ भारतीयों की आवाज बने भारत के प्रधानमंत्री का संयुक्त राष्ट्र संघ में अपने संबोधन में इस बात का उल्लेख करना कि संयुक्त राष्ट्र के पुनर्गठन की आवश्यकता है, यह बतलाता है कि वास्तव में संयुक्त राष्ट्र अपने उद्देश्य से भटक गया है। दुनिया के सबसे बड़े और जीवंत लोकतंत्र के गौरवान्वित नागरिक होने के नाते भारत के प्रधान सेवक के द्वारा दिए गए उद्बोधन से संयुक्त राष्ट्र के मठाधीशों को संबोधन के पीछे छिपे उद्देश्यों को समझने की जरूरत है। 121 भाषाओं और 270 बोलियों से समृद्ध भारत जो वर्ष 2027 तक विश्व के सबसे बड़े आबादी वाले देश की कमान थामेगा, की बातों पर गौर नहीं करना पूरे वैश्विक समुदाय के लिए आघात करने जैसा है। वर्ष 1945 में विश्व के महत्वपूर्ण देशों के संयुक्त प्रयास से वैश्विक सुरक्षा, शांति एवं वैभवता के उद्देश्यों की पूर्ति के लिए इस वैश्विक संस्था का गठन किया गया था।
यह सत्य है कि स्थापना काल से ही इस शीर्षस्थ संस्था के द्वारा पूरे विश्व में सभी क्षेत्रों में अपना अमूल्य योगदान देते हुए अपनी अनोखी पहचान बनाई है, परंतु कुछ वर्षों से ऐसा लग रहा है कि शीतयुद्ध के अंतिम पड़ाव पर अब इस महान संस्था ने अपनी प्रासंगिकता खो दी है। विश्व अवगत है कि दुनिया के सबसे विविधता वाला देश भारत है, जिसकी सांस्कृतिक एवं भाषाई विविधता की दुनिया की अन्य देशों से तुलना नहीं की जा सकती है। यह ऐसा देश है जहां सभी धर्म के लोगों को समान अधिकार दिए गए हैं, उस देश के प्रधान सेवक की बातों पर गौर करना जरूरी है। वर्तमान का भारत नए आशावादी, आत्मविश्वास और आत्मनिर्भर बनने की ओर अग्रसर है। सदियों की औपनिवेशिक दासता की बेड़ियों को तोड़ने के बाद भारत आज गणतंत्र है। इसलिए अब विश्व के सर्वश्रेष्ठ एवं शिखर संस्था में इनकी आवाज सुननी ही होगी। भारत को 75 सालों से संयुक्त राष्ट्र में वह सम्मान नहीं मिल पाया जिसका वह हकदार है।भारत इस दोयम दर्जे का बर्ताव कब तक सहन करता रहेगा?
आज भारत विश्व में एक सफल, सशक्त, समृद्ध एवं आचरण पूर्ण भारत बन चुका है। भारत वर्ष 2022 में अपनी आजादी का 75वीं वर्षगांठ मनाने की तैयारी में है। इस कारण इस लोकतंत्र की इस महान व्यक्तित्व को संयुक्त राष्ट्र के सबसे प्रमुख एजेंसी सुरक्षा परिषद में स्थाई सदस्य के रूप में चुना जाना एक वैश्विक जरूरत है। विश्व के इस शीर्षस्थ संस्था के द्वारा इस संबंध में निर्णय लेने से यह भारत को एक उपहार मिलने जैसा हो जाएगा। अगर ऐसा नहीं हुआ तो यह माना जायेगा कि वर्तमान का संयुक्त राष्ट्र अपने उद्देश्य से भटक गया है और इस संस्था की प्रासंगिकता खत्म हो चुकी है।

लेखक- डॉ0 अशोक, पटना

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