उत्तर वैदिक काल से ही भारत एक कृषि प्रधान देश है। जिसकी आधार भूत संरचना का निर्माण कृषि एवं इसके संसाधनो पर टिका है। इसके बिना देश ही नहीं अपितु सम्पूर्ण श्रृष्टि का सर्वांगीण विकास असंभव है। लेकिन आज का मनुष्य कृषि को व्यवसाय के रूप में स्वीकार नहीं कर पाता है। चाहे निजी क्षेत्र हो या सरकारी, वह तो प्रोफेशनल दिखना चाहता है। यदि कोई जमीनी स्तर से राजनीति कर ऊपर उठता है, मंत्री, मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री इत्यादि बन जाता है और फिर वही कृषि जगत के मसीहा जगत पालनहार पर राजनीति करता है। लेकिन वह सुबह उठकर मुंह में निवाला देने से पूर्व भूल जाता है कि हमारा असली मसीहा कौन है?
यहीं से सारा खेल शुरू होता है। एक मेहनतकश मजदूर किसान अपने सारे सपने, सारी ख्वाहिशें दिल में छुपाकर अपनी फसल उगाता है, अपने मेहनत, पसीने की कमाई से सींचकर फसल कमाता है। परन्तु जब यही मेहनतकश अपनी फसल को बाजार में बेचने जाता है तो सरकारी व निजी गोदामों में औने-पौने दामों में बेचने पर मजबूर हो जाता है। अपने हक़ के लिए यदि आन्दोलन करे तो पुलिस की लाठी-डंडे सहता है। किसानों की फसलों के लिए MSP (न्यूनतम समर्थन मूल्य) भी निर्धारित नहीं है जबकि उद्योगपतियों के माल बेचने हेतु MRP (अधिकतम खुदरा मूल्य) लागू होता है| इसे वर्तमान सरकारी तंत्र की मनमानी समझो या फिर किसानों की बेबशी, लेकिन वास्तव में आज किसानों की दुर्दशा ही है।

लेखक- तेजपाल विश्वकर्मा, सम्भल

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