मुम्बई के बाद अब दिल्ली की बारी, जंतर-मंतर की हो रही तैयारी

जब पीड़ित को न्याय नहीं मिलता तो आन्दोलन ही एकमात्र रास्ता बचता है। आन्दोलन की अनिवार्यता तब और बढ़ जाती है, जब पीड़ित की श्रेणी जघन्य हो। ऐसी स्थिति में सामाजिक संस्थाओं की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो जाती है। दो माह पूर्व उत्तर प्रदेश के उन्नाव जनपद में बिहार थानाक्षेत्र के भाटनखेड़ा गांव में ऐसी ही एक जघन्य घटना हुई। घटना के आरोपितों की गिरफ्तारी हो तो गई पर न्याय अभी अधर में है। सामूहिक बलात्कार की दंश झेल चुकी युवती खुद के न्याय की लड़ाई लड़ते हुये हैवानों द्वारा लगाई आग में झुलसकर खाक हो गई। इस बीच ऐसी भी जानकारी मिल रही कि पीड़ित पक्ष को न केवल परेशान किया जा रहा है बल्कि सुरक्षा के नाम पर पीड़ित परिवार को घर में ही नजरबन्द जैसी स्थिति का सामना करना पड़ रहा है। सरकार ने भी वादों की जो झड़ी लगाई थी वह दिवास्वप्न साबित हो रहे हैं। ऐसी स्थिति में सामाजिक संगठन मूक कैसे रह सकते हैं?
उक्त घटना के पीड़ित परिवार को न्याय मिले, सरकार अपना किया वादा पूरा करे, इसी मांग को लेकर महाराष्ट्र और मुम्बई विश्वकर्मा समाज ने पिछले महीने 7 जनवरी को मुम्बई के आज़ाद मैदान में धरना दिया था। उस धरने के बाद भी सरकार और प्रशासन के रवैये में कोई बदलाव नहीं हुआ है। आरोपियों को किस तरह बचाया जा सके इसके लिये आरोपियों के खासमखास सत्ता में बैठे लोग साजिश रचने में लगे हैं। पीड़ित परिवार को किस तरह झुकाया या तोड़ा जाय इसकी जिम्मेदारी पुलिस प्रशासन को सौंपी गई लगता है। तभी तो स्थानीय पुलिस पीड़ित परिवार को तरह-तरह से प्रताड़ित कर रही है।
सरकार और स्थानीय पुलिस प्रशासन के रवैये ने एक बार फिर सामाजिक संगठनों को कुछ करने पर मजबूर कर दिया है। 7 जनवरी को मुम्बई के आज़ाद मैदान में हुये धरने के बाद 18 फरवरी को दिल्ली के जंतर-मंतर की तैयारी है। देश की राजधानी में पीड़ितों की आवाज़ उठाने के लिये कई दर्जन सामाजिक संगठन एकजुट हो रहे हैं। जंतर-मंतर पर होने वाले धरने में उन्नाव की घटना के साथ ही कई अन्य घटनाओं का मुद्दा भी उठाया जायेगा। उत्तर प्रदेश के पूर्व मंत्री रामआसरे विश्वकर्मा, पूर्व राष्ट्रपति स्व0 ज्ञानी जैल सिंह के पौत्र इंद्रजीत सिंह, वरिष्ठ समाजसेवी दिनेश कुमार वत्स सरीखे लोग इस धरना की अगुवाई करेंगे।

-कमलेश प्रताप विश्वकर्मा

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