गौरवपूर्ण श्रद्धांजलि: बीतराग स्वामी कल्याणदेव महराज

भारत भूति संतों, ऋषियों, मुनियों की तपोस्थली रही है। यहां एक से बढ़कर एक संत हुये और सभी ने अपनी अलग पहचान बनाई। इसी भूमि पर स्वामी कल्याणदेव महराज भी जन्म लिये जिनकी पहचान अद्भुत व अनोखी है। संत होना और मानव कल्याण के लिये संतत्व का पालन करना दोनों में काफी अन्तर है। स्वामी कल्याणदेव महराज ने जीवन पर्यन्त समाज की भलाई के लिये कार्य किया।
स्वामी कल्याणदेव महराज के उम्रकाल में भी कई संत पैदा हुये। इनमें से ज्यादातर ने अंधविश्वास को ही बढ़ावा दिया। यहां तक कि कई संत खुद को भगवान के रूप में भी प्रतिष्ठापित होने का पूरा प्रयास किया। एक संत ऐसे भी हुये जिन्होंने अपने आसन से एक फीट ऊपर उठकर खुद को सर्वश्रेष्ठ घोषित किया था। हालाकि वह संत अब दुनिया में नहीं हैं पर इतना जरूर कहना चाहूंगा कि उनके आसन से एक फीट ऊपर उठने के चैलेंज को जादूगर ओ0पी0 शर्मा ने अंधविश्वास करार देते हुये आसन से साढ़े तीन फीट ऊपर उठने का शानदार प्रदर्शन किया है, जादूगर ने इसे अपनी कला बताते हुये अंधविश्वास से दूर रहने को भी कहा है।
वीतराग स्वामी कल्याणदेव महराज के बारे में बताना है कि वह अन्य संतो से अलग मानव कल्याण के लिये अपना जीवन समर्पित कर दिया। उन्होंने अपने जीवनकाल में हमेशा जरूरतमंदो की मदद करने का संदेश दिया। वह कहा करते थे कि अपनी जरूरत कम करो और जरूरतमंदो की हरसंभव मदद करो। परोपकार को ही वह सबसे बड़ा धर्म मानते थे, ऐसा उन्होंने जीवन पर्यन्त किया भी। सदैव पानी में भिगोकर भिक्षा में ली गई रोटी खाने वाले स्वामी जी ने 129 वर्ष की आयु में 300 से अधिक शिक्षा केन्द्र स्थापित कर रिकार्ड स्थापित किया। इसीलिये उन्हें शिक्षा ऋषि कहा गया। यही वजह है कि अन्य संतों और स्वामी कल्याणदेव में जमीन-आसमान का अन्तर है। स्वामी कल्याणदेव महराज तीन पीढ़ी के दृष्टा रहे हैं। उन्होंने अपने जीवन के 100 साल समाजसेवा को ही दिया।
ऐसी महान विभूति को शत-शत नमन।
—कमलेश प्रताप विश्वकर्मा

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