आगामी दिनों में और बढ़ेगी भगवान विश्वकर्मा के वंशजों की ताकत

वह दिन दूर नहीं जब आने वाले दिनों में भगवान विश्वकर्मा के वंशजों की ताकत और बढ़ेगी। सिर्फ ताकत ही नहीं, हर क्षेत्र में विश्वकर्मा ही विश्वकर्मा दिखाई पड़ेगा और यह सब भगवान विश्वकर्मा के आशीर्वाद से सम्भव होगा। विगत वर्षों में किसी भी क्षेत्र में विश्वकर्मा वंशजों की गणना नहीं होती थी, परन्तु आज प्रत्येक क्षेत्र में विश्वकर्मा आगे आ रहा है। बीते 15 जुलाई को विश्व युवा कौशल दिवस और 29 अगस्त को मन की बात में भारत के प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी ने जिस तरह भगवान विश्वकर्मा और उनके वंशजों का गुणगान किया वह भविष्य की ताकत का एहसास करा रहा है। मोदी के उपरोक्त बयान को राजनीतिक गलियारों में लॉलीपॉप और विश्वकर्मा समाज को लुभाने का तरीका कहा जा सकता है, परन्तु सच यह है कि विश्व के सबसे पसंदीदा व ताकतवर नेता को भी यह एहसास है कि बिना “विश्वकर्मा” नाम का उपयोग किये आधुनिक भारत की कल्पना सम्भव नहीं है। यही कारण है कि उन्होंने दोनों अवसर पर भगवान विश्वकर्मा का स्मरण, वेदों में वर्णित प्रमुख श्लोक का उच्चारण और विश्वकर्मा वंशजों का गुणगान करना नहीं भूले।

विश्वकर्मा वंशजों की बढ़ती ताकत और मिलते अवसर के सम्बंध में यहां कुछ और उदाहरण प्रस्तुत करना जरूरी समझ रहा हूं। उत्तर प्रदेश की राजनीति में वर्ष 1998 में विश्वकर्मा समाज के एक व्यक्ति रामआसरे विश्वकर्मा का उदय हुआ। वह लगातार 12 वर्ष तक विधान परिषद के सदस्य रहे। इसी बीच साल 2003 में उन्हें मुलायम सिंह यादव की सरकार में उच्च शिक्षा राज्यमन्त्री बनाया गया। रामआसरे के नाम के साथ विश्वकर्मा लगा होने के कारण पूरे देश के विश्वकर्मा वंशजों में राजनीतिक उत्सुकता बढ़ी और लोग राजनीति व सत्ता में भागीदारी के लिये संघर्ष करना शुरू कर दिये। आज की तारीख में पूरे देश के कई राज्यों में विश्वकर्मा वंशीय विधायक और मन्त्री हैं। और तो और गुजरात में बदले ताजा हालात के बीच भगवान विश्वकर्मा पूजा के एक दिन पूर्व नौ साल से विधायक रहे जगदीश पांचाल विश्वकर्मा को मन्त्रिमण्डल में सम्मिलित कर विश्वकर्मा वंशजों की बढ़ती ताकत का एहसास करा दिया है। आज देश की लोकसभा और राज्यसभा में भी रामचन्द्र जांगड़ा, कैलाश सोनी, प्रदीप टमटा, अजय टमटा जैसे विश्वकर्मा वंशज प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। यह संख्या कम जरूर है परन्तु भविष्य में बढ़ती जायेगी।

आज प्रत्येक क्षेत्र में विश्वकर्मा वंशीय अपना परचम फहरा रहे हैं, हां! यह जरूर है कि विकास की मूल धारा राजनीति में काफी पीछे रहे। अब राजनीति में भी विश्वकर्मा की संख्या पर्याप्त दिखने लगी है। स्थिति यह है कि उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी और समाजवादी पार्टी में विश्वकर्मा समाज के लोगों को पदाधिकारी बनाने की होड़ सी लग गई है। कभी सिर्फ मेहनत-मजदूरी करके जीविका चलाने वाला विश्वकर्मा वंशीय समाज अब जागृत हो गया है। उसे मालूम है कि बिना सत्ता में भागीदारी के समाज का विकास सम्भव नहीं है, और सत्ता में भागीदार होने का रास्ता राजनीति है।

उत्तर प्रदेश में बीते पंचायत चुनाव में विश्वकर्मा वंशियों ने सैकड़ों प्रधान, क्षेत्र पंचायत सदस्य, जिला पंचायत सदस्य और ब्लॉक प्रमुख जैसे पदों पर आसीन होकर अपनी राजनीतिक सीढ़ी मजबूत की है। आगामी विधानसभा और लोकसभा के चुनावों में भी विश्वकर्मा वंशीय अपना परचम लहरायेंगे। विश्वकर्मा वंशीय अब घरों से बाहर निकलना, सभा-सम्मेलनों में भाग लेना और आन्दोलन के लिये सड़कों पर उतरना शुरू कर दिये हैं। राजनीतिक दलों को एहसास हो चला है कि विश्वकर्मा वंशीय भी बड़ी संख्या में हैं और इन्हें भागीदारी मिलनी चाहिये। राजनीति में बढ़ती भागीदारी यह एहसास कराती है कि जल्द ही विश्वकर्मा वंशियों की ताकत और बढ़ेगी जिससे विधानसभा व लोकसभा में उनकी आवाज गूंजेगी।

-कमलेश प्रताप विश्वकर्मा

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