कोरोना, कर्फ्यू और काशी

मस्त शहर अलमस्त नगर मस्ती बिन कंगाल भइल हव,
भांग ठंडई छोड़ा मरदे खैनी के हड़ताल भइल हव।

आइल कोरोना मरकिरौना जान परल हव सांसत में,
मुहं तोप के बइठल मनई हिले करेजा खांसत में।
मांड़ भात से काम चले बस कई दिन देखले दाल भइल हव
भांग ठंडई छोड़ा मरदे खैनी के हड़ताल भइल हव।

अस्सी वाली अड़ी बंद ह चना चबेना चाय नदारद,
घचर-घचर बतिआवे वाला गायब राजनीति के नारद।
गुरु बनारसी फोन पे कहलें जिनगी अब जंजाल भइल हव
भांग ठंडई छोड़ा मरदे खैनी के हड़ताल भइल हव।

सुबह के नश्ता पुड़ी जिलेबी खातिर मन अउंजाइल बा,
चाट समोसा लस्सी अब त शहरे छोड़ पराइल बा।
मगही पान घुलवले जइसे लागे केतना साल भइल हव
भांग ठंडई छोड़ा मरदे खैनी के हड़ताल भइल हव।

टीवी पर भी एकै बतिया कर्फ्यू और कोरोना के बा,
एकै रोगवा दुनियाभर में धइले कोना कोना के बा।
खून के आंसू बाटे रोववले अइसन चीन चंडाल भइल हव
भांग ठंडई छोड़ा मरदे खैनी के हड़ताल भइल हव।

दरशन पूजन पर गरहन ह घाट सबे सूनसान परल,
चौक गोदौलिया मैदागिन लहुराबीर बिरान परल।
डीएलडब्ल्यू सुंदरपुर लंका तक बेहाल भइल हव
भांग ठंडई छोड़ा मरदे खैनी के हड़ताल भइल हव।

आन्ही आवै बइठ गंवावे इहे सूत्र अपनावा जा,
जइसे तइसे घर में बइठल एक-एक दिन बितावा जा।
खोल केवाड़ी घर से बहरी निकलल अब त काल भइल हव
भांग ठंडई छोड़ा मरदे खैनी के हड़ताल भइल हव।

लेखक- रत्नेश चंचल, वाराणसी (मो0- 9335505793)

1 thought on “कोरोना, कर्फ्यू और काशी

  1. शानदार कविता
    विश्वकर्मा किरण हिंदी साप्ताहिक पत्रिका परिवार को साधुवाद??

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