तंगहाली में जीने को मजबूर पंजाब के सिकलीगर सिख

जालंधर। किसी समय ‘चाकू छुरियां तेज करा लो’ की आवाज देने वाले और गुरु गोविंद सिंह के हथियार निर्माता सिकलीगर सिख पंजाब में बेहद खराब स्थिति में जीने को मजबूर हैं। सिख संस्थाओं की अनदेखी तथा आधुनिक हथियारों और औद्योगिक—प्रौद्योगिकी के आगमन ने सिकलीगरों को कठिन आर्थिक रूप से प्रभावित किया है। एक अप्रचलित व्यवसाय की खोज में लगे हुए, वे अब एक गरीब और पिछड़े लोग हैं, जो भारतीय संविधान के तहत परिभाषित अनुसूचित जातियों में से एक हैं।


35 से 40 हजार सिकलीगर पंजाब में करते हैं निवास—
विश्वभर में सिकलीगर सिखों की संख्या लगभग 7 करोड़ हैं जिनमें से लगभग 35 से 40 हजार सिकलीगर पंजाब में निवास करते हैं। दक्षिण और मध्य भारत में इन्हें कामगर, करिनगर, कुचबंद, लोहार, पांचाल साईकलगर, सक्का, सिकलगर, सिकलगर सिख, सिकलीगर सिख लोहार के नाम से भी जाना जाता है। यह समुदाय जो कभी हथियार बनाने और चमकाने के शिल्प में माहिर थे। गड्डीलोहार के रूप में जाने जाते इन सिखों को सिकलीगर शब्द गुरु गोविंद सिंह द्वारा लोहा देने वाले इन सिखों को दिया गया था जिन्होंने लोहगढ़ (आनंदपुर साहिब में लौह किला) को सिख सेना में बदल दिया था। मध्ययुगीन भारत में, सिकलीगरों की भाले, तलवार, ढाल और तीर के निर्माण के लिए बहुत मांग थी। दुनिया जिसे दमास्कस स्टील के नाम से जानती है, उसे भारतीय लोहारों द्वारा निर्मित किया गया था और लोहे के छररं के रूप में दमास्कस को भेजा गया था। दमास्कस लोहे का उपयोग कुछ बेहतरीन तलवारें बनाने में किया जाता है।


किसी ने नहीं ली पंजाब में रह रहे सिकलीगरों की सुध—
शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक समिति तथा ब्रिटिश सिख काउंसिल द्वारा सिकलीगर सिखों के उत्थान के लिए समय-समय पर कल्याण कार्य करने के दावे किए जाते रहे हैं लेकिन वास्तविकता इसके विपरीत है। वास्तव में मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र के सिकलीगरों के लिए एसजीपीसी तथा ब्रिटिश काउंसिल आर्थिक सहायता देने के साथ साथ उनके बच्चों के लिए शिक्षा तथा स्वरोजगार आदि के लिए कार्य करती हैं लेकिन आज तक किसी ने भी पंजाब में रह रहे सिकलीगरों की सुध नहीं ली। संत बाबा देसू सिंह सिकलीगर सभा पंजाब के महासचिव कुलदीप सिंह ने मीडिया को बताया कि पंजाब में 35 से 40 हजार जबकि जालंधर में लगभग दो हजार सिकलीगर सिख रहते हैं। उन्होंने बताया कि आज तक किसी ने उन्हें किसी प्रकार की सहायता नहीं दी है। उन्होंने कहा कि जत्थेदार अवतार सिंह मक्कड़ जब एसजीपीसी के प्रधान थे तब उन्होंने एक बार 10-10 हजार रुपये की आर्थिक सहातया दी थी। उन्होंने कहा कि कुछ माह पूर्व आर्थिक सहायता के लिए वह लगभग 350 लोगों के फार्म एसजीपीसी कार्यालय लेकर गए थे लेकिन उन्होंने यह कहते हुए फार्म लेने से मना कर दिया कि आर्थिक सहायता देने की ऐसी कोई योजना नहीं।


शिक्षा से वंचित रह जाते हैं सिकलीगर समुदाय के बच्चे—
कुलदीप सिंह ने बताया कि सिकलीगर समुदाय के पास अपना कोई स्थाई ठिकाना नहीं होने के कारण उनके बच्चे शिक्षा से वंचित रह जाते हैं और वह खुद भी कोई स्थाई कारोबार नहीं कर पाते। पंजाब में सिकलीगर चाकू छुरियां और कैंचियां तेज करने, कड़ाही बनाने तथा ताला चाबियां बनाने का कार्य गली—गली घूम कर करते हैं। मूल रूप से लोहार सिकलीगर सिख पारंपरिक रूप से चाकू, तलवार और बंदूक बनाने का कार्य करते थे। उनके हथियार बनाने के कारोबार के कारण, उन्हें हमेशा पुलिस द्वारा संदिग्ध रूप से देखा जाता है और उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है। उल्लेखनीय है कि एसीजीपीसी तथा ब्रिटिश सिख काउंसिल सिकलीगरों के लिए मकान बना कर देने तथा योग्यता अनुसार कारोबार शुरू करने में सहायता देने के दावे करते हैं। इस संबंध में एसजीपीसी कार्यालय में सम्पर्क करने पर एसजीपीसी के मीडिया इंचार्ज ने दावा किया कि सिकलीगरों के लिए एसजीपीसी समय समय पर कई कल्याण योजनाएं शुरू करती हैं। वहीं ब्रिटिश सिख काउसिल के पदाधिकारी केवल सिंह से बात करने पर उन्होने स्पष्ट किया कि उनकी संस्था पंजाब के सिकलीगरों के लिए अभी कुछ नहीं कर रही। गुरु गोबिंद सिंह ने राम चंद नामक एक लोहार को सिख बनाया था जो पहला सिकलीगर सिख बना। वह पंज प्यारों में से एक नहीं था, लेकिन वह पंज प्यारों और गुरु गोविंद सिंह के साथ चामकौर की लड़ाई में लड़ा था और रात में किले से बाहर गुरु के साथ था। गड्डीलोहार सबसे पहले सिखों के संपर्क में आए।

(साभार)

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