हमारा भोज्य कैसा हो?

-डाॅ0 अमलदार नीहार
शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्’ निश्चित रूप से धर्म का (धर्मयुक्त कार्य करने के निमित्त) पहला साधन शरीर ही है (इसलिए शरीर का निरोग बने रहना अति आवश्यक है)। चरक संहिता में इसे पुरुषार्थचतुष्टय की सिद्धि का मूल हेतु माना गया है–
धर्मार्थकाममोक्षाणामारोग्यं मूलमुत्तमम्।
रोगास्तस्यापहर्तारः श्रेयसो जीवितस्य च।।1

वात, पित्त तथा कफ-ये तीनों जब शरीर में विषम दशा में होते हैं तो हानिकारक होते हैं और जिस व्यक्ति में ये सभी सम अवस्था में हों तो उसकी पाचन क्रिया (जठराग्नि का कार्य) ठीक रहती है। मनुष्य-शरीर के तीन आधार-स्तम्भ हैं- ‘त्रयउपस्तम्भा इति–आहारः स्वप्नो ब्रह्मचर्यमिति’, अर्थात् आहार, स्वप्न (उचित समय पर सोना) और ब्रह्मचर्य पालन।2 हमारे ऋषि-महर्षि अपने खान-पान तथा आचार-विचार में विशेष ध्यान रखते थे, इसलिए वे दीर्घजीवी होते थे। वेद का यह निर्देश है कि मनुष्यों को प्रातः एवं सायं दो बार भोजन ग्रहण करना चाहिए। इसके बीच में भोजन नहीं करना चाहिए। यह भोजन की विधि अग्निहोत्र के समान ही है। मल-मूत्र त्याग करने के बाद, इन्द्रियों के निर्मल तथा शरीर के हल्के रहने पर, ठीक से डकार आने एवं मन के प्रसन्न रहने पर, वायु का संक्रमण ठीक रहने पर, भूख लगने के बाद, भोजन के प्रति रुचि उत्पन्न होने पर, आमाशय के ढीले पड़ जाने पर भोजन करना चाहिए; क्योंकि यही भोजन का उचित अवसर है–
सायं प्रातर्मनुष्याणामशनं श्रुतिबोधितम्।
नान्तरा भोजनं कुर्यादग्निहोत्रसमो विधिः।।
विसृष्टे विण्मूत्रे विशदकरणे देहे च सुलघौ
विशुद्धे चोद्गारे हृदि सुविमले वाते च सरति।
तथान्नश्रद्धायां क्षुदुपगमने कुक्षौ च शिथिले
प्रदेय सत्त्वाहारे भवति भिषजां कालः स तु मतः।।3

आचार्य वाग्भट ने भी ठीक यही बात स्वीकार की है।4 बदलती ऋतुओं के अनुसार हमें अपने भोजन में परिवर्तन करते रहना चाहिए। हमारे आचार्यों ने भोजन की मात्रा पर भी विचार किया है। नित्य मात्रा के अनुसार ग्रहण किया गया आहार जठराग्नि को प्रदीप्त करता है। मात्रा का निर्धारण गुरु एवं लघु द्रव्यों के आधार पर होना चाहिए। तेल तथा घी में तले हुए पदार्थ, दूध, मलाई, रबड़ी आदि का सेवन भूख की मात्रा से आधा ही करना उचित है और लघु(सुपाच्य) पदार्थाें का तृप्तिपर्यन्त करना चाहिए। डाॅ0 श्री सोहन जी सुराना ने अपने आहार-विवके नामक निबन्ध में भोजन के विषय में निर्देश देते हैं कि जो लोग बुद्धिजीवी हैं, जिन्हें अधिक श्रम नहीं करना पड़ता–जैसे कार्यालय में काम करने वाले अथवा सेनिवृत्त, उनको अधिक मात्रा में भोजन की आवश्यकता नहीं है।, पर आदत से विवश होकर वे मात्रा का संतुलन नहीं करते, जिससे मोटापा बढ़ता जाता है। अनियमित भोजन स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है, इससे पाचन क्रिया में गड़बड़ी आती है। ठीक समय पर, ठीक स्थान पर बैठकर, चिन्तारहित होकर, शान्त वातावरण में धीरे-धीरे चबाकर भोजन करना स्वास्थ्यवर्द्धक है। भोजन सात्त्विक होना चाहिए। मसाले वाली, तली हुई गरिष्ठ वस्तुएँ और अनेक प्रकार के व्यंजन, अधिक मिठाई, खटाई, चटपटे एवं नमकीन भोजन स्वास्थ्य के लिए होनिकारक हैं। अधिकांश बीमारियाँ अति भोजन से होती हैं। डाॅ0 सुराना ने सुझाव दिया कि बहुत चीनी का प्रयोग भी न हो, अधिक चीनी से पेट, मोटापा और कृमि रोग हो जाते हैं। बहुत चिकनाई लीवर, हृदय रोग और मोटापा का कारण बनती है। अधिक नमक खाने से हृदय रोग, गुर्दे का रोग, रक्तचाप, चर्म रोग आदि पनपते हैं। नमक जो खनिज है, कृत्रिम है और जो नमक शाक, भाजी और फलों में मिलता है, वह प्राकृतिक लवण है, वह लाभदायक है। बहुत चीनी के उपयोग से अधिक बीमारियाँ पैदा होती हैं, दाँत खराब हो जाते हैं। अधिकांश लोग अनियमित आहार लेते हैं। भोजन न अधिक मात्रा में होना चाहिए न कम मात्रा में। पहले खाया हुआ पचा नहीं और पुनः भोजन कर लेना ‘अध्यशन’ कहलाता है।भोजन खड़े-खड़े, चलते-फिरते, लेटे-लेटे करना हानिकर है।5 आहार को न अधिक जल्दी, न अधिक देर से, न बोलते हुए, न हँसते हुए, अपने अगल-बगल चारों ओर भली भाँति परीक्षण कर, आहारद्रव्य में मन लगाकर भोजन करना चाहिए। जल भोजन के एक घण्टे पहले या बाद में लेना उचित है।सूर्याेदय के बाद एक याम, अर्थात् तीन घण्टे तक भोजन न करें और दो याम, यानी छह घण्टे से अधिक का विलम्ब भी ठीक नहीं। भोजन का सदैव आदर करें, प्रत्युत उसकी प्रशंसा करते हुए भोजन ग्रहण करें। कभी उसकी निन्दा नहीं करनी चाहिए। इससे बल तथा पराक्रम विकसित होता है।

हमारे जीवन तथा आरोग्य को यह सम्पूर्ण बाह्य प्रकृति और आन्तरिक प्रकृति सँभाले रहती है। यह शरीर ही पंच महाभूतों से निर्मित हुआ है। हम अनायास नहीं कहते कि ‘माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः’ । यह आकाश जो सबको धारण करता है, इसलिए पिता तुल्य है, यह अग्नि तत्त्व जो अनावश्यक दूषित को भीतर-बाहर जलाता, पकाता-पचाता हुआ हमारी भूख-प्यास, हमारे ज्ञान-विज्ञान, संधान तथा हमारी कामनाओं, मनोविकारों तक परिव्याप्त है, जल तत्त्व केवल हमारी प्यास ही नहीं बुझाता, पेड़-पौधों, वनस्पतियों की नस-लस में, हमारी स्फीत शिराओं में लहू बन संचरित होता रहता है। हमें भीतर-बाहर से तरल बनाये रहता है, हमारी संवेदनशीलता, व्यायत विराट करुणा और प्रेम, द्रवीभूत हृदय की सजलता इसी जल की शीतलता और जीवन-धारकता से सम्भव है। पृथिवी या पृथ्वी से ही हमारा शरीर ‘पार्थिव’ कहलाता है। यह ज्योतिवाह सूर्य सम्पूर्ण प्रकृति तथा सजीव का जीवनदाता, जिसकी किरणों में व्यामिश्र सात रंग हमारे जीवन-स्वास्थ्य के हेतु बने हुए हुए हैं, ऐसे ही सूर्य-किरणों से चिकित्सा नहीं की जाती।निरर्थक नहीं है सूर्य को ‘देवता’ और ’नारायण’ कहना। अपनी अमृतमयी किरणों के कारण ही चन्द्रमा ओधधीश कहा जाता है। ये अनन्त ग्रह-नक्षत्र केवल आकाश में चमकने के लिए नहीं, इनकी गति से इस सृष्टि पर भी अच्छा-बुरा प्रभाव पड़ता है। हमारी सदानीरा नदियाँ, समुद्र तथा भूगर्भ-स्थित अनेक धातुओं से बने रसायन, पर्वतों तथा जंगलों की जड़ी-बूटियाँ, अनेक पुकार के पृष्प-लतादि, पिचुमर्द नीम, अशोक, अश्वत्थ, जम्बु, रसाल, मधूक, आमलक, उदुम्बर, नारिकेल, बिल्व वृक्षादि, तुलसी, मन्दार, फल-फूल-सब्जियाँ और ये बदलती ऋतुएँ, सबकी सब हमारे स्वास्थ्य को सही रखने में सहायक।

हमारे शरीर और मन के सम्यक् स्वास्थ्य में प्राणसंचार का विशेष महत्त्व है। यदि प्राण सुस्थ हैं तो हम स्व-स्थ हैं, ऐसा समझना चाहिए। कहते हैं कि इस काया-नगरी में प्राण ही राजा है–‘कायानगरमध्ये तु मारुतः क्षितिपालकः’।देवता, मनुष्य, पशु और समस्त प्राणी प्राण से ही अनुप्राणित है। प्राण ही जीवन है। इस प्राण शक्ति का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण विज्ञान है। ऋग्वेद में प्राण को प्रत्यक्ष मानकर उसका अभिनन्दन किया गया है–‘वायो हि प्रत्यक्षं ब्रह्मासि’।यहाँ प्राण को जगत् का कारण-ब्रह्म माना गया है। मंत्र ज्ञान तथा पंचकोश प्राण पर ही आधारित है। प्राण को ही ऋषि माना गया। मंत्रद्रष्टा ऋषियों को उनके शरीर के आधार पर नहीं, वान् प्राण के ही आधार पर ‘ऋषित्व’ प्राप्त हुआ है। उदाहरणार्थ इन्द्रियों के नियन्त्रण को ‘गृत्स’ और कामदेव को ‘मद’ कहते हैं, ये दोनों ही कार्य प्राणशक्ति के द्वारा सम्पन्न होते हैं, इसलिए उन ऋषि को ‘गृत्समद’ कहते हैं।‘विश्वंमित्रं यस्य असौ विश्वामित्रम्’ तात्पर्य यह कि प्राण का अवलम्बन होने से समस्त विश्व मित्र है, इसलिए विश्वामित्र कहा गया।मानव शरीर में वृत्ति के कार्य-भेद से इस प्राण वायु को दस भिन्न-भिन्न नामों से विभक्त हैं–
प्राणोऽपानः समानश्चोदानव्यानौ च वायवः।
नागः कूर्मोऽथ कृकरो देवदत्तो धनंजय।। (गोरक्षसंहिता)
अर्थात् प्राण, अपान, समान, उदान, व्यान, नाग, कूर्म,, कृकर, देवदत्त और धनंजय–ये दस प्रकार के प्राणवायु हैं। शरीर को पूर्णतः स्वस्थ बनाये रखने में इनके क्या कार्य हैं, इस पर आचार्य पण्डित श्री चन्द्रभूषण जी ओझा ने अपने लेख में व्यापक प्रकाश डाला है।6 यही कारण है कि शरीर तथा इन्द्रियों के संयमन के लिए अष्टांग योग में प्राणायाम का विशेष महत्त्व है।मन का भी प्राण से घनिष्ठ सम्बन्ध है और इस प्राणायाम को मनुष्य जीवन में आत्यन्तिक महत्त्व है। अपने इसी लेख में आचार्य जी ने सूक्ष्म प्राणों की भी चार्चा की है।‘‘शरीर में प्राणवाहिनी नाड़ियाँ असंख्य हैं, इनमें पन्द्रह प्रमुख हैं-1-सुषुम्णा, 2-इड़ा, 3-पिंगला, 4-गांधारी, 5-हस्तिजिह्वा, 6-पूषा, 7-यशस्विनी, 8-शूरा, 9-कुहू, 10-सरस्वती, 11-वारुणी, 12-अलम्बुषा, 13-विश्वोदरी, 14-शखिनी और 15-चित्रा। प्राणायम में इनका विशेष महत्त्व है। जो सम्यक् श्वसन की विधि नहीं जानते, वे अकाल ही मृत्यु को प्राप्त होते हैं।

नित्यकर्म-पूजाप्रकाश में भोजन करने की व्यवस्था दी गयी है कि भोजनालय में प्रवेश करने के पूर्व हाथ-पैर को धोना तथा मुँह तथा दाँतों को भलीभाँति साफ कर लेना चाहिए, फिर गायत्री मंत्र से दो बार आचमन करे। थाल रखने की जगह पर थाल के बराबर जल से दाहिनी ओर से चैकोर घेरा बना ले फिर भगवान के भोग लगाये अन्न को पात्र में परोसवाकर(यदि भोग न लगा हो तो निवेदन कर ले) हाथ जोड़कर प्रणाम करे, हाथ में जल लेकर दिन में ‘सत्यं त्वर्तेन त्वा परिषिंचामि’ तथा रात के समय ‘ऋतं त्वा सत्येन परिषिंचामि’ कहकर प्रोक्षण करे। पुनश्च पात्र से दस या पाँच अंगुल हटकर ‘ऊँ भूपतये स्वाहा। ऊँ भुवनपतये स्वाहा। ऊँ भूतानां पतये स्वाहा’ मंत्र पढ़कर तीन ग्रास निकाले। तत्पश्चात् मौन होकर ही पंच प्राणाहुति करे–ऊँ प्राणाय स्वाहा। ऊँ अपानाय स्वाहा। ऊँ व्यानाय स्वाहा। ऊँ उदानाय स्वाहा। ऊँ समानाय स्वाहा। इसके बाद भी अनेक मंत्रों के साथ मृत पितरों के लिए भोजन अर्पित करने और बाद में उच्छिष्ट को कौओं आदि को देने की व्यवस्था है।7 सामान्य जनों के लिए इतना बड़ा पचड़ा पालना सम्भव नहीं।
अन्न को पहला ब्रह्म माना गया है। तैत्तिरीयोपनिषद् की भृगुवल्ली में इसकी महत्ता बतायी गयी है। वहाँ भृगु को वारुणि कहा गया है और उनके आदेशानुसार वे क्रमशः अन्नमय ब्रह्म, प्राणमय ब्रह्म, मनोमय ब्रह्म, विज्ञानमय ब्रह्म और आनन्दमय ब्रह्म की उपासना करते हैं और इसी अन्न में सबको अन्तर्भुक्त करते हुए उसे प्राणमय, जल तथा ज्योतिर्मय, फिर पृथ्वी और आकाश तक को अन्नरूप बताया गया है और अन्न की उपासना का व्रत लेने की प्रेरणा दी गयी है, जैसे–1-‘‘अन्नं न निन्द्यात्। तद्व्रतम। प्राणो वा अन्नम्। शरीरमन्नादम्। प्राणे शरीरं प्रतिष्ठितम्। शरीरे प्राणः प्रतिष्ठितः। तदेतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितम्।……’’, 2-‘‘अन्नं च परिचक्षीत्। तद् व्रतम्। आपो वा अन्नम्। ज्योतिरन्नादम्। अप्सु ज्योति‘ प्रतिष्ठितम्।……’’, 3-अन्नं बहु कुर्वीत्। तद् व्रतम्। पृथिवी वा अन्नम्। आकाशो अन्नादः। पृथिव्यामाकाशः प्रतिष्ठितः। आकाशे पृथिवी प्रतिष्ठिता। तदेतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितम्।……’’ इसी अन्न से योगक्षेम है, इसी से अतिथि सेवा, उसमें देवता का वास मानकर उसकी सेवा का निर्देश दिया गया है।8
श्रीमद्भगवद्गीता में मनुष्य की रुचि-अनुरूप आहार की तीन श्रेणियाँ बतायी गयी हैं–
आहारस्त्वपि सर्वस्य त्रिविधो भवति प्रियः।
यज्ञस्तपस्तथा दानं तेषां भेदमिमं शृणु।।9
(मनुष्य श्रद्धा-भक्ति और प्रकृति की दृष्टि से तीन प्रकार के होते हैं-सात्त्विक, राजस् और तामस् और उसी के अनुरूप क्रमशः देवताओं, यक्षों और राक्षसों तथा भूत-प्रेतों को पूजते हैं के भाव को आगे बढ़ाते हुए) यहाँ तक कि प्रत्येक व्यक्ति जो भोजन पसन्द करता है, वह भी प्रकृति के गुणों के अनुसार तीन प्रकार का होता है। यही बात यज्ञ, तपस्या तथा दान के लिए भी सत्य है। अब इनके भेदों के विषय में सुनो–
आयुः सत्त्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्द्धनाः।
रस्याः स्निग्धाः स्थिरा हृद्या आहाराः सात्त्विकप्रियाः।।10
अर्थात् जो सात्त्विक भोजन व्यक्तियों को प्रिय होता है, वह आयु बढ़ाने वाला, जीवन को शुद्ध करने वाला तथा बल, स्वास्थ्य, सुख तथा (प्रीति)तृप्ति प्रदान करने वाला होता है। ऐसा भोजन रसमय(मधुर), स्निग्ध(चिकनाई से युक्त, यहाँ पशु-वध से प्राप्त चर्बी से इसका मतलब नहीं है), स्वास्थ्यप्रद(निरोग बनाये रखने वाला) तथा हृदय को भाने वाला(पोषक, लाभकारी) होता है(जैसे-नाना प्रकार के मौसमी लाभकारी फल, स्वस्थ पशु से प्राप्त दूध, दही, घी, मट्ठा, पौष्टिक दाले व अन्य अनाज आदि)।
इसी प्रकार–
कट्वम्ललवणात्युष्णतीक्ष्णरूक्षविदाहिनः।
आहारा राजसस्येष्टा दुःखशोकामयप्रदाः।।11
अर्थात् अत्यधिक कटु(कड़वे), अम्लीय(अत्यधिक खट्टे), उष्ण(गर्म), तीक्ष्ण(तीखे, चटपटे–मिर्च-मसाले वाले), रूक्ष(शुष्क, नीरस), विदाहक(जीभ, कण्ठ, हृदय और आँतों में जलन पैदा करने वाले, जलाने वाले) भोजन विशेष रूप से रजोगुणी व्यक्तियों को प्रिय होते हैं, ऐसे भोजन दुःख, शोक तथा रोग उत्पन्न करने वाले होते हैं(जो आगे चलकर विषम रूप ले लेते हैं)।
और तामसी के लक्षण निम्नवत् होते हैं–
यातयामं गतरसं पूति पर्युषितं च यत्।
उच्छिष्टमवि चामेध्यं भोजनं तामसप्रियम्।।12
अर्थात् यातयाम(भोजन करने से तीन घण्टे पूर्व पकाया हुआ, स्वादहीन(जिसकी रसात्मकता समाप्त हो गयी हो। जीभ को ‘रसना’ कहते हैं, वह स्वादिष्ट भोजन के साथ रसन क्रिया करती है और उसकी सम्मिलित लार से भोजन सुपाच्य तथा पौष्टिक बन पाता है), पूतियुक्त(दूषित, सड़ा हुआ, दुर्गन्ध से भरा हुआ), पर्युषित(बासी, अखाद्य), उच्छिष्ट(जूठन हो, य), अमेध्य(जो यज्ञ के लिए अपवित्र हो, अस्पृश्य हो–मांस-मछली-मदिरा आदि) वस्तुओं से युक्त भोजन उन लोगों को प्रिय(रुचिकर) होता है, जो तामसी (हिंसक स्वभाव के, उन्मादक पदार्थ–नशा आदि का सेवन करने वाले होते हैं) प्रकृति के होते हैं।
यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्विषैः।
भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात्।।13
इसका मूल आशय यह कि जो यज्ञशिष्टसेवी हैं, अर्थात् पुरोडाश को प्रसाद रूप में ग्रहण करते, यज्ञ सम्पादित होने पर जो प्रसाद रूप भोजन मिलता है,उसे ही ग्रहण करते हैं, वे सन्त होते हैं और( ऐसा करने से) उनके पाप नष्ट हो जाते हैं, किन्तु (अन्य लोग)जो अपने ही इन्द्रिय-सुख के लिए,अपनी ही तृप्ति मात्र के उद्देश्य से भोजन पकाते और खाते हैं,(समझ लीजिए कि) वे पाप को ही खाते हैं,अर्थात् निस्सन्देह रूप से वे पापी होते हैं।

स्थूल रूप में यज्ञ का अर्थ लोग यही समझते हैं कि शास्त्रों के पवित्र मंत्र के साथ कृत अनुष्ठान में यज्ञ कुण्ड में (प्रज्वलित अग्नि में) आहूत देवताओं की उपस्थिति मानकर उन्हें जो हव्य अर्पित किया जाता है, वह यज्ञ है और उस अनुष्ठान में पुष्प,फल, दुग्ध,दधि तथा पक्वान्न जो प्रसाद रूप में वितरित किया जाता है, वही पुरोडाश या यज्ञशिष्ट है और उसे खाने वाला यज्ञशिष्टाशिन। यह मान लिया जाता है कि अपने परिश्रम से अर्जित अन्न को प्रथमतः देवरूप में ईश्वर को हमने पवित्र भाव से अर्पित कर दिया, इसलिए उसे कमाने में अनजाने में जो कुत पाप हुआ हो,वह नष्ट हो गया। जो ऐसा नहीं करता, वह पाप का ही सेवन करता है,उसका भागीदार होता है।
वास्तव में यज्ञ क्या है? संस्कृत में यज्ञ का एक नाम है–‘‘अध्वर‘‘। अध्वर माने जो ध्वर से रहित हो।ध्वर का अर्थ होता है–‘‘हिंसा‘‘। इसका तात्पर्य यह कि पवित्र कार्य,हिंसा से रहित अनुष्ठान। इसी प्रकार ‘ अज‘ का अर्थ बकरा ही नहीं होता,पुराना ऐसा धान भी होता है, जिसमें अंकुरण की क्षमता न हो, उस अज की बलि दी जानी चाहिए(बलि=यज्ञ)। यह सब छोडिए, यज्ञ में हिंसा का प्रचलन क्यों शुरू हुआ होगा, इसकी भी कुछ कथा है,फिर कभी। यज्ञ का अर्थ इतना सीमित नहीं है। सम्पूर्ण सृष्टि में जो परिवर्तन चक्र चल रहा है, यज्ञ का अनुष्ठान ही प्रतीत होता है। निरन्तर बडी सूक्ष्मता के साथ सूर्य अपनी रश्मियों से नदी-और समुद्र से वाष्प रूप में जल को खींच लेता हैं। यह नैसर्गिक टैक्स है, जो लेते-देते कोई नहीं देख पाता, लेकिन उसका कई गुना वापस कर देता है मेघ जल वर्षण करके। ग्रीष्म का सूरज अपनी प्रखर किरणों से तपाता है तो चन्द्रमा अपनी चाँदनी के रूप में औषधि का लेपन कर देता है, आकाश तुहिन-बिन्दुओं के मलहम से कोमलकिसलय लतिका, पुष्प,तरुपल्लव, शष्प-शाद्वल को शीतल कर देता है। निरन्तर विभ्राट विराट मृत्यु-मुख-विवर में लीयमान संसृति और सुकोमल हस्तपाद के साथ प्रसूत क्रन्दन करते शिशु मानव तथा मानवेतर अनेक प्राणियों के भी।
कुदरत यज्ञानुष्ठान में व्यस्त है। पढ़ना–ज्ञानार्जन करना, पढ़ाना भी यज्ञ है।इसी प्रकार भूखे उदर की पूर्ति के पवित्र भाव के साथ प्रभु का स्मरण करते हुए भोजन पकाना और सप्रेम भोजन परोसना, भी यज्ञ है और जब हम अपने शरीर-मन्दिर में स्थापित आत्मरूप परमेश्वर को धारण करने हेतु उसे पुष्ट करने के उद्देश्य से जब सात्विक भोजन ग्रहण करते हैं तो समझिए कि यज्ञ सम्पन्न हो रहा है। इन तमाम यज्ञों में सात्विकता होनी चाहिए। तामसी और राजसी विचार इस यज्ञ को प्रदूषित करते हैं। श्वान-शूकर की तरह केवल अपनी इन्द्रिय-तृप्ति के लिए अकेले भोजन पकाना और खाना पाप है।

हमारी माताएँ,बहनें और बेटियाँ इसीलिए अन्नपूर्णा कहलाती हैं कि सबको भोजन से सन्तुष्ट करने के बाद स्वयं भोजन करती हैं,इसलिए सच्चे अर्थों में सबसे महान यज्ञ तो वही करती हैं और प्रायः सर्वाधिक पवित्र यज्ञ करने वाली यह मातृशक्ति भूखी रह जाती है बेचारी,जिसकी खबर कोई नहीं लेता। हम अच्छी तरह से जानते हैं कि निम्न-मध्यवर्गीय परिवारों की स्त्रियाँ इसी मर्यादा-पालन में कुपोषण का शिकार हो जाती हैं। इसका ध्यान हमें रखना चाहिए। द्रौपदी के अक्षय पात्र की जो कथा है या सीता की रसोई का जो आख्यान है, उसका प्रतीकात्मक अर्थ यही है। इसी अन्नमय कोश से बनता है हमारा मन तो जिस भाव से सम्पृक्त होकर जैसा दूषित या अदूषित अन्न हम ग्रहण करते हैं,वैसा ही हमारा मन हो जाता है,फिर उसी से बनता है विचार और स्मरणशक्ति, उसी विचार-बुद्धि से प्रेरित होकर हम नाना प्रकार के कर्म करते हुए उसका दण्ड भोगने को विवश होते हैं। दूषित अन्न खाने के कारण ही महात्मा भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य आदि ने अन्याय का साथ देते हुए कुलवधू द्रौपदी के चीर-हरण के समय सिर झुकाए नपुंसक की भाँति चुपचाप बैठे रह गये।महाभारत में इसकी ज्ञानवर्द्धक उपकथा है कि द्रौपदी के प्रश्नों का उत्तर देते हुए ग्लानिपूर्वक दुर्योधन के दूषित अन्न ग्रहण को ही इस नपुंसक मौन रहस्यपूर्ण हेतु बताया । इसी दूषित अन्न या धन खाकर चापलूसी करने को विवश व्यक्ति खुद पाप खाता है और अपने बच्चों को पाप ही खिलाता है।
जिन परिवारों में ओछे लोग भोजन पकाकर घर के बूढे-बुजुर्गों और सभी सदस्यों को बिना खिलाये स्वयं भोजन करते हैं,वे ईश्वर के अपराधी हैं। यह ध्यान रहे कि वह ईश्वर भूख-प्यास के रूप में भी प्रत्येक पिण्ड में विद्यमान है। सुदामा की दरिद्रता का कारण यह कि बिना अपने मित्र रूप ईश्वर को खिलाये गुरुमाता के दिये तण्डुल खुद चोरी से खा जाते थे और श्रीकृष्ण की सम्पन्नता का कारण यह कि वे माखन,दही से लेकर निज कल्याहार तक ग्वालबालों के साथ बाँटकर खाते थे। जो राजनेता, मंत्री, अपने विभाग के अधीनस्थ कर्मचारियों, शिक्षकों और अधिकारियों को यथासमय उचित वेतन और पेंशन नहीं देना चाहता और स्वयं खाता है छप्पन भोग भोगता है और भ्रष्टाचार करता है, वह महापापी है और केवल पाप को ही खाता है।

-संदर्भ:
1-आरोग्य अंक में उद्धृत-चरक सू0 1/15-16(पं0 श्रीशशिनाथ जी झा, वेदाचार्य का लेख-जीवन का प्रथम आधार आहार), पृष्ठ-378
2-वही, (चरक संहिता सू0 11/35) पृष्ठ-378 पर उद्धृत
3-वही, पृष्ठ-378
4-वाग्भट-अष्टांगहृदयम् सू0 8/55
5-डाॅ0 श्रीसोहन जी सुराना का लेख–आहार-विवेक(कल्याण का आरोग्य अंक, पृष्ठ377)
6-आचार्य पंडित श्री चन्द्रभूषण जी ओझा का लेख-प्राणवायु और वायु का सम्बन्ध(कल्याण का ‘आरोग्य अंक’, पृष्ठ 131-133)
7-नित्यकर्म–पूजाप्रकाश(भोजनादि शयनान्तविधि), पृष्ठ 179-181
8-तैत्तिरीयोपनिषद्-भृगुवल्ली-सप्तम अनुवाक् से दशम अनुवाक् तक(ईशादि नौ उपनिषद्-व्याख्याकार हरिकृष्णदास गोयन्दका), पृष्ठ-389-397
9-श्रीमद्भगवद्गीता-अध्याय-17, श्लोक संख्या-7
10-श्रीमद्भगवद्गीता-अध्याय-17, श्लोक संख्या-8
11-श्रीमद्भगवद्गीता-अध्याय-17, श्लोक संख्या-9
12-श्रीमद्भगवद्गीता-अध्याय-17, श्लोक संख्या-10
13-श्रीमद्भगवद्गीता-अध्याय-3, श्लोक संख्या-13

रचनाकाल: 28 मार्च, 2022
बलिया, उत्तर प्रदेश
रचनाकार- डाॅ0 अमलदार ‘नीहार’
अध्यक्ष, हिन्दी विभाग
श्री मुरली मनोहर, टाउन स्नातकोत्तर महाविद्यालय, बलिया (उत्तर प्रदेश)
सम्पर्क सूत्र: 9454032550

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