साम्प्रदायिकता

साम्प्रदायिक का अभिप्राय अपने धार्मिक सम्प्रदाय से भिन्न अन्य सम्प्रदाय या सम्प्रदाययों के प्रति उदासीन, घृणा, उपेक्षा, विरोधी या आक्रमण की भावना है जिसका आधार वास्तविक या काल्पनिक भय है| इसमें एक सम्प्रदाय के लोग सोचते है की उनके सम्प्रदाय को अन्य सम्प्रदाय वाले नस्त कर रहे है या करने की कोशिश कर रहे हैं। इसमें अपने सम्प्रदाय के लोगों को जान-माल की क्षति अन्य सम्प्रदाय वाले से होने की आशंका करते हैं| इसमें राजनीतिक एवं धार्मिक दोनों ही के कारण भिन्न सम्प्रदाय में झगरा होने की संभावना बनने के साथ ही साथ झगरा हो भी जाता है| इससे बड़े पैमाने पर नरसंहार भी हो जाता है| मुख्य रूप से धार्मिक कट्टरता, साम्प्रदायिकता को जन्म देती है| इसमें एक धर्म वाले लोग अन्य धर्म को निम्न समझते है और अपने धर्म को उच्च समझते है|
एक धर्म वाले लोग जब दुसरे धर्म वाले लोगों से यह वास्तविक या काल्पनिक रूप से विश्वास करते है की उनके धर्म के विकास के मार्ग मई दुसरे धर्म वाले रोड़े बनकर विकास कार्य अवरुद्ध करेंगे तो साम्प्रदायिकता की भावना पनप जाती है जिस कारन व्यक्ति अपने अपने धर्म वाले को एक जुट बनाने का प्रयास करते है और अन्य धर्म के दोष को उजागर करते हैं| इससे व्यक्ति उग्र होते हैं एवं सांप्रदायिक तनाव उत्पन्न होती है जो बढ़ते-बढ़ते हिंसक रूप धारण कर लेता है और विरोधी धर्म के व्यक्तियों के बीच हत्याएं, आगजनी आदि घटनाएं होने लगती है|
राजनेता अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिए जाति या धर्म का सहारा लेते हैं| साम्प्रदायिकता में मुख्य रूप से दो सम्प्रदाय या धर्म या जाति का विवाद होता है जो नरसंहार का आधार बन जाता है| भारतवर्ष में मुख्यतया दो सम्प्रदाय हिन्दू एवं मुस्लिम के बीच ही विवाद उत्पन्न होते रहा है जिसकारण बहुत दंगे हुए एवं धन-जन की क्षति हुई| जब सांप्रदायिक तनाव के कारण दंगे होते है तो सम्बंधित इलाके मैं आशांति के साथ—साथ आर्थिक दयनीयता भी आती है| हमें साम्प्रदायिकता की भावना को नियंत्रित करना चाहिए| प्रबुद्ध नागरिकों को चाहिए की जनजागरण लाकर साम्प्रदायिकता से होने वाली हानि से आम लोगों को समझाए| जनजागरण से साम्प्रदायिकता को भावना कुछ हद तक नियंत्रित हो सकती है| सरकार को भी साम्प्रदायिकता से सम्बन्धित दोषी पर कड़े दंड का शक्ति से पालन करना चाहिए| किसी भी देश का विकास उस देश के शांति का समानुपाती होता है| राजनेता को धर्म या जाति आधार बनाकर राजनीति नहीं करना चाहिए| हमारे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी भी सांप्रदायिक तनाव के विरोधी रहे हैं| उन्होंने हिन्दू-मुस्लिम धर्म वाले के बीच सौन्दर्य प्रेम को बढ़ावा का सदा आवाहन करते रहे हैं| देश को उन्नति के लिए हमें इस नारे को बुलंद करना होगा ”हिन्दू-मुस्लिम, सिक्ख, इसाई, हम हैं आपस में भाई-भाई|”

लेखक— अनिल कुमार शर्मा
विभागाध्यक्ष, वनस्पति विज्ञान
बनारसी लाल सर्राफ वाणिज्य महाविद्यालय, नौगछिया
तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय, भागलपुर|
मो0-9939266560

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