पत्रकारिता के दर्द की अकथ कहानी

-अमलदार नीहार

पत्रकारिता सबसे बडे जोखिम का पेशा है। पत्रकार यदि झूठ लिखे तो जनता के चित्त से उतर जाता है और जब सच लिखना चाहे तो अदृश्य ताकतें मार देती हैं। उसे कायदे से पेट भरने को भी नहीं मिलता और एक खबर पाने के लिए कभी-कभी जान पर खेल जाता है। वह पत्रलेखन भी करता है, कैमरामैन भी वही है, हरकारा भी है, इण्टरव्यू लेने और छापने वाला। चींटियों की तरह खबरें चुनता हैं, कुत्ते की तरह खबरों को सूँघता है, चिडियों की तरह उसके सार को चुगता है, चिन्तक और विवेचक की तरह विश्लेषण करता है, सन्त की तरह शोषित के पक्ष में सहृदय और करुण, फौजी की तरह हर मोर्चे पर मुस्तैद और जागरूक–सच्चा देशभक्त और वीर सिपाही हमारा लोकोन्मुख पत्रकार।

पत्रकार को सत्तापोषी नहीं जनचेतना का चित्रकार होना चाहिए–घटनाओं का यथातथ्यप्रस्तोता ही नहीं उसके कारक तत्वों का भी जानकार, दूरद्रष्टा, अतीत-वर्तमान और भविष्य का अध्येता, पढाकू, साहित्यकार की तरह संवेदनशील और सच्चा शुभचिन्तक उत्पीडित समाज का, बेहद ईमानदार, बहिष्कृत-तिरस्कृत और दलित दुनिया की कुचली गयी जिजीविषा को आशा का सम्बल प्रदान करने वाला। एक सत्यान्वेषी पत्रकार सदैव लोकहित का पहरुआ होता है–लोकतंत्र की दबी हुई आवाज़ का नायक, देश और समाज का हितैषी और बिन पारितोषिक-पुरस्कार की प्राप्त्याशा में खटने-खपने वाला कार्यकर्ता। वह महात्मा गाँधी, आम्बेडकर, गणेश शंकर विद्यार्थी, महामना मदन मोहन मालवीय, बाबूराव विष्णुराव पराड़कर की विरासत को आगे बढाना चाहता है, पर दुर्मद काली ताकतों से दुर्बल शरीर भला क्या लोहा लेगा? उसके प्राण और स्वजनों की सुरक्षा की भला किसे चिन्ता है?

कोई बतायेगा कि एक साधारण पत्रकार कितना कमा लेता है महीने में? उसका निर्धारित वेतनमान भी है कुछ? अच्छा, उसकी दिहाडी ही क्या है? शायद मनरेगा मजदूर के बराबर भी नहीं। सरकारी कर्मचारी तो वह है नहीं। फिर किसके लिए इतनी भागदौड़ करता है? कौन देता है उसे आने-जाने के लिए पेट्रोल का दाम? उसके मोबाइल का खर्च? सुबह से शाम तक बिन घास खाये घोडे की तरह दौड़ता ही रहता है और समय पर भोजन नहीं नसीब। हाय री जिन्दगी! भारत जैसे देश में–कस्बे, शहर से लेकर नगर-महानगरों तक छोटे-बडे अखबार और खबरिया चैनल्स से जुडे हुए कितने लाख कर्मचारी और पत्रकार होंगे? उनमें से कितने प्रतिशत ऐसे हैं, जो अपनी पत्रकारिता से एक बेटे को महँगी शिक्षा दे सकते हैं?

उनके घर की हालत देखिए, यदि पुश्तैनी हालत मजबूत न हो, बच्चे चार पैसे कहीं न कमा पा रहे हों तो सच कहूँ वे तो भुखमरी ही झेल रहे हैं। उनका जीवनबीमा कोई कराता है अखबार का मालिक? उसके जीवन और स्वास्थ्य की गारण्टी कौन लेता है? एक नेकदिल पत्रकार भी इस दौर में कभी दबंगों से धमकाया जाता है, कभी अनैतिक राजनेता से भी उसे अपनी इज्जत बचानी मुश्किल हो जाती है तो कभी अधिकारी अपनी गर्दन बचाने के लिए उसे फँसाने की सोच लेते हैं।

जब पूरा देश ही और यह दुनिया भी झूठ, फरेब, बेईमानी, लूट, भ्रष्टाचार से बजबजा रही हो तो इस बात को कोई ईमानदार पत्रकार कैसे लिखे, कब तक लिखे, कितना लिखे और जान जोखिम में डालकर क्यों लिखे? इसका कोई जवाब नहीं है किसी के पास। उसके खाने को सम्मान का निवाला नहीं और लाले पडे हुए हों जब जान के भी।

लेखक- अमलदार नीहार
हिन्दी विभाग
श्री मुरली मनोहर टाउन स्नातकोत्तर महाविद्यालय
बलिया (उत्तर प्रदेश)

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