“विश्वकर्मा” के नाम पर घोषित हो रही योजनाएं परंतु विश्वकर्मा समाज को कोई लाभ नहीं

विश्वकर्मा! विश्वकर्मा!! विश्वकर्मा!!! पिछले 2 साल के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने करीब दर्जन भर से ज्यादा बार “विश्वकर्मा” शब्द का प्रयोग किया है। चाहे विश्वकर्मा पूजा का अवसर रहा हो, संसद में बजट पारित होने का अवसर रहा हो, नये संसद भवन के उद्घाटन का अवसर रहा हो, भारत मंडपम के उद्घाटन का अवसर रहा हो या फिर लाल किले की प्राचीर से देश के नाम संबोधन का अवसर रहा हो, ऐसे तमाम मौकों पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विश्वकर्मा शब्द का प्रयोग किया है। विश्वकर्मा के नाम पर कई योजनाओं की घोषणा की गई। योजनाएं तो विश्वकर्मा के नाम पर बनाई जा रही हैं लेकिन इन योजनाओं से विश्वकर्मा समाज को कोई भी लाभ नहीं हो रहा है। विश्वकर्मा समाज की सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक दशा जस की तस बनी हुई है।
जनसंख्या में सबसे कम व सामाजिक स्थिति में सबसे कमजोर ऐसे कई समाज हैं जिन्होंने राजनीति में मुकाम हासिल कर लिया है। उन्हें यह मुकाम ऐसे ही नहीं मिला, सत्ताधारी दलों ने अवसर प्रदान किया। वहीं विश्वकर्मा समाज को किसी भी सत्ताधारी दल ने राजनीति में और सत्ता में भागीदारी का कोई विशेष अवसर नहीं दिया। उदाहरण के तौर पर उत्तर प्रदेश देश का सबसे बड़ा प्रदेश होने के साथ ही विश्वकर्मा समाज की जनसंख्या बहुत बड़ी है। आंकड़ों के मुताबिक उत्तर प्रदेश में विश्वकर्मा समाज की आबादी करीब ढाई करोड़ है। इस ढाई करोड़ में विश्वकर्मा वंशीय समाज के सभी वर्ग आते हैं जिन्हें मनु, मय, त्वष्टा, शिल्पी और दैवज्ञ के नाम से जाना जाता है। यहां पर चाहे कांग्रेस की सरकार रही हो, समाजवादी पार्टी की सरकार रही हो, बहुजन समाज पार्टी की सरकार रही हो या इस समय भारतीय जनता पार्टी की सरकार है, किसी भी सरकार ने सत्ता में भागीदारी का अवसर नहीं दिया। सिर्फ एक बार समाजवादी पार्टी ने एमएलसी बनाकर मन्त्री बनाया और 12 साल बाद भाजपा ने एक एमएलसी बनाया है। अपवाद स्वरूप कुछ छोटे पद भी लोगों के पास रहे हैं। राजनीतिक पार्टियां यह सभी अपने फायदे के अनुसार करती हैं।
आजादी के बाद से ही यूपी का सदन विश्वकर्मा समाज से वीरान रहा है, समाज का एक भी विधायक-सांसद नहीं। वर्ष 1998-2010 के बाद अब जाकर भाजपा ने एक एमएलसी बनाया है। इतनी बड़ी आबादी वाले समाज मे मात्र एक एमएलसी?? अधिकांश निगम, बोर्ड, आयोग खाली पड़े हैं, सरकार चाहे तो इन संस्थानों में लोगों को अध्यक्ष व सदस्य नामित कर भागीदारी दे सकती है। सत्ताधारी दल संगठन में सम्मानजनक दायित्व देकर समाज को भागीदारी दे सकते हैं। लेकिन विडंबना है कि विश्वकर्मा समाज के साथ सभी दल बराबर छल करते आए हैं। संगठनों में भी सम्मानजनक पद की बजाय औपचारिकता निभाई जाती है। विश्वकर्मा के नाम पर योजना तो चलाते हैं परंतु इन योजनाओं का लाभ दूसरों को ही मिलता है और हमेशा की तरह विश्वकर्मा समाज ठगा रह जाता है।
-कमलेश प्रताप विश्वकर्मा