पाकिस्तान के मंसूबों को ध्वस्त कर चुके हैं रतन सिंह विश्वकर्मा

मुजफ्फरनगर। भारत की सीमाओं पर कई बार छिड़ चुकी जंग के बाद भी आज हम सुरक्षित हैं, क्योंकि सीमाओं पर तैनात फौजी अपनी जांबाजी से दुश्मनों को मुंह की खिलाने में सक्षम रहे हैं। कई युद्ध को नजदीक से देखकर दुश्मनों के आक्रमणों को झेलने वाले जांबाज सैनिक कोई और नहीं, बल्कि हमारे बीच से ही सीमाओं पर दुश्मनों से लोहा लेकर उनके मंसूबों को ध्वस्त कर चुके हैं। ऐसे ही जांबाज फौजी रतन सिंह विश्वकर्मा (पांचाल) के कार्यों और उनके संघर्ष से हम आपको रूबरू करा रहे हैं।
शहर के सिविल लाइन स्थित जसवंतपुरी निवासी 77 वर्षीय रतन सिंह विश्वकर्मा (पांचाल) दसवीं की पढ़ाई पूरी करने के बाद ही देशसेवा का जज्बा लेकर फौज में भर्ती हो गए थे। पूर्व फौजी रतन सिंह विश्वकर्मा बताते हैं कि रुड़की स्थित बैलगाम इंजीनियरिग ग्रुप सेंटर में उन्हें ट्रेनिग दी गई। इसके बाद उन्हें उस टीम में शामिल किया गया, जो सीमा पर लड़ने वाले सैनिकों की फौज को भेजने के साथ उनकी सुविधाओं के लिए महत्वपूर्ण कार्यों में भूमिका निभाती है और जरुरत पड़ने पर फौज के साथ सीमा पर युद्ध में भी डटकर दुश्मनों से लोहा लेने का काम करती है। फौजी विश्वकर्मा ने बताया कि जब 1965 में अटारी सीमा पर पाकिस्तान से युद्ध हुआ तो वे भी रेजीमेंट के साथ अमृतसर पहुंचे और अगले दिन सीमा पर मोर्चाबंदी कर दी। उस दौरान उनकी पैनी निगाहों ने दुश्मनों के मंसूबों को पकड़ लिया। वहां स्थित होगिल नहर के किनारे पाकिस्तानी फौज द्वारा बिछाई गई बारूदी सुरंग को पहले ही देखकर करीब दो हजार भारतीय फौजियों की जिन्दगियां सुरक्षित की गई। एंटी टैंक और एंटी पर्सनल बारूद को उखाड़कर उन्होंने अपनी बारूदी लाइन बिछाकर दुश्मनों के सामने चुनौतियां खड़ी की। 18 दिन युद्ध चलने के बाद वहां सीजफायर की घोषणा हुई। उन्होंने बताया कि पाकिस्तानी फौज के सामने बिना डरे रस्सी में ईंट बांधकर नहर की गहराई भी नापने का काम किया, जबकि दुश्मन सामने से गोली चलाने की धमकी देते रहें। इसके बाद फौजी रतन सिंह ने 1971 में भी पाकिस्तानी फौज के साथ मुक्तिवाहिनी सेना (सिविल वर्दी वाली सेना) में हिस्सा लेकर दुश्मनों के हौंसले पस्त करने का काम किया। नदी पर पुल बनाकर अपनी फौज को दूसरी तरफ भेजा, जिसके बाद भारत ने पाकिस्तान के हजारों सैनिक बंधक बनाए। रतन सिंह का कहना है कि फौज में नौकरी के दौरान देशहित ध्यान में रखकर ही सेवा की है, जिसके दम पर हर कार्य को पूर्ण कर भारतीय सैनिकों का हौंसला कभी टूटने नहीं दिया।
बेटे को भी बनाया फौजी—
लगभग 16 साल परिवार से दूर रहकर फौज में जिम्मेदारी निभाने वाले पूर्व फौजी रतनसिंह विश्वकर्मा ने अपने छोटे बेटे योगेन्द्र कुमार को भी फौजी बनाया। उन्होंने बताया कि उनके चार बेटे हैं। वें चाहते थे कि एक बेटा जरूर सेना में भर्ती हो। योंगेन्द्र कुमार के भर्ती होने के बाद उन्होंने बेटे का हमेशा हौंसला बढ़ाया और ईमानदारी से देश की सेवा करने की सीख दी।
(साभार)

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