सनातन धर्म के रक्षक भगवान विश्वकर्मा

यूं तो भगवान विश्वकर्मा को सृष्टि रचयिता, देवलोक का इंजीनियर, आदि अभियंता आदि-आदि शब्दों से विभूषित किया जाता है। भगवान विश्वकर्मा ने किया भी है इतना तब जाकर उन्हें इतनी उपमा मिलती है। इन सभी के बीच सबसे बड़ी बात यह कि भगवान विश्वकर्मा सनातन धर्म के सबसे बड़े रक्षक थे। देवी-देवताओं के ऊपर जब भी संकट आया, जब भी असुरों से लड़ाई हुई या आसुरी शक्तियों का विनाश करना हुआ तो देवताओं को अस्त्र-शस्त्र भगवान विश्वकर्मा ने ही प्रदान किया। सभी जानते हैं कि बिना अस्त्र-शस्त्र के कोई भी लड़ाई नहीं जीती जा सकती।
भगवान विश्वकर्मा ने न सिर्फ सृष्टि की सुंदर रचना की, बल्कि उसे बचाया भी है। जो आज हिन्दू धर्म की बात करते हैं, बड़े-बड़े व्याख्यान देते हैं, उन्हें पता होना चाहिये कि हिन्दू धर्म बचा कैसे? सनातन धर्म ही हिन्दू धर्म है। सनातन धर्म की रक्षा भगवान विश्वकर्मा ने देवताओं को अस्त्र-शस्त्र प्रदानकर किया। आजकल बहुत सी जगहों पर तमाम तरह की कथाएं-चर्चाएं होती हैं, बात हिन्दू धर्म की रक्षा की होती है, सनातन धर्म को बचाने के लिये तमाम देवताओं की बात होती है, परन्तु भगवान विश्वकर्मा के योगदान की चर्चा नहीं होती। जबकि सच्चाई यह है कि सारे वेद-पुराण, उपनिषद या जितने भी धर्मिक ग्रन्थ हैं, सभी में भगवान विश्वकर्मा का वर्णन है। सभी युगों में भगवान विश्वकर्मा के योगदान को दर्शाया गया है। आज के कथावाचक लोग जानबूझकर भगवान विश्वकर्मा का नाम नहीं लेते हैं। वह जानते हैं कि यदि भगवान विश्वकर्मा की महिमा का वर्णन किया गया तो उनके वंशजों में आत्मसम्मान जाग जायेगा और वह भी प्रजा की श्रेणी से ऊपर उठ जायेंगे। विश्वकर्मा वंशजों के प्रति यह एक बड़ी साजिश है।
भगवान विश्वकर्मा ने आदिकाल में आसुरी शक्तियों का विनाश करने के लिये शस्त्र उपलब्ध कराए तो भगवान विश्वकर्मा के वंशजों ने देश को आज़ाद कराने में अतुलनीय योगदान दिया। भारत की आज़ादी के लिए बलिदान होने वाले सपूत इन विश्वकर्मा वंशियों के लिये धरती के भगवान से कम नहीं थे। अंग्रेजी असुरों से देश को आज़ाद कराना अपना धर्म समझते थे। जिस तरह आदिकाल में असुरों से लड़ने के लिये भगवान विश्वकर्मा ने देवताओं को शस्त्र बनाकर दिया ठीक उसी तरह उनके वंशजों ने अंग्रेजों से लड़ने के लिये आज़ादी के दीवानों को शस्त्र बनाकर दिया। विश्वकर्मा वंशजों ने सिर्फ शस्त्र बनाया ही नहीं, लड़ाई भी लड़ी और बलिदान भी दिया।
इतिहासकार स्व0 गुरूराम विश्वकर्मा “मधुकर” द्वारा लिखित पुस्तक “भगवान विश्वकर्मा का इतिहास” में वर्णन है- फ्रांसीसी पर्यटक बर्नियर ने भारत प्रवास के दौरान 1857 के स्वाधीनता संग्राम का जिक्र करते हुये अपने मित्रों को पत्र लिखकर बताया है जिसमें जिक्र किया है- ‘‘युद्ध के लिये अस्त्र-शस्त्र बनाने वाले विश्वकर्मावंशियों के साथ बहुत ही अमानवीय अत्याचार हुये। असंख्य मारे गये, आत्महत्या कर लिये, शेष कार्य-कुशल कारीगरों को यूरोपीय देशों तथा समुद्री टापुओं पर छोड़ दिया गया। बर्नियर लिखता है कि भारतीय विश्वकर्मावंशी लोहार इतने कट्टर और स्वाभिमानी थे कि उनके द्वारा निर्मित ढाल, कटार, बर्छे और तलवारें अंग्रेजों के छक्के छुड़ा देते थे। विश्वकर्मावंशियों ने लड़ाई के लिये सिर्फ हथियार बनाये ही नहीं बल्कि अंग्रेजों से लड़े भी।’’ बर्नियर के इस पत्र लेख ने यह स्पष्ट कर दिया कि भगवान विश्वकर्मा के दिव्य शक्ति से निर्मित अस्त्र-शस्त्र से राक्षसों का बध हुआ तो उनके वंशजों ने मानवयुग में देश की रक्षा के लिये अंग्रेज राक्षसों का बध करने के लिये अस्त्र-शस्त्र बनाया।

—कमलेश प्रताप विश्वकर्मा

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