डॉ0 रामशरण विश्वकर्मा का निधन, सरकारी सेवा के दौरान विदेशों में किया था भारत का प्रतिनिधित्व

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लखनऊ। अपर निदेशक, उत्तर प्रदेश वित्त सेवा से सेवानिवृत्त एवं अनेकों नियमावलियों व मार्गदर्शक पुस्तिकाओं के रचयिता डॉ0 रामशरण विश्वकर्मा का निधन हो गया। वह 87 वर्ष के थे और काफी लम्बे समय से बीमार चल रहे थे। मूलतः आज़मगढ़ जिले के निवासी डॉ0 रामशरण विश्वकर्मा ने समाज में गहरी छाप छोड़ी है। इनका जन्म 4 मई, 1936 को आज़मगढ़ से महज 4 किमी दूरी पर स्थित खोजापुर गांव में हुआ था। प्राथमिक शिक्षा मतौलीपुर स्थित प्राइमरी पाठशाला से ग्रहण किया जो घर से 4 किमी की दूरी पर थी। हाईस्कूल और इण्टरमीडिएट की पढ़ाई आज़मगढ़ शहर के डीएवी कॉलेज से पूरी की। बाद में उच्च शिक्षा ग्रहण करने के लिये इलाहाबाद चले गये।

इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक तथा परास्नातक की डिग्री हासिल करने के बाद ही उनका चयन सरकारी सेवा में हो गया। उनकी आरम्भिक सेवा खण्ड विकास अधिकारी पद से शुरू हुई। वर्ष 1964 से उत्तर प्रदेश वित्त एवं लेखा सेवा में योगदान देना प्रारम्भ किया। सेवा के दौरान विधि-स्नातक, साहित्य रत्न एवं अर्थशास्त्र में डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की। प्रबन्धन विशेषज्ञ के रूप में अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन द्वारा आयोजित दो सम्मेलनों में विदेशों में भारत का प्रतिनिधित्व भी किया। प्रदेश के विभिन्न विभागों की उच्चस्तरीय सेवा करने के पश्चात दिसम्बर 1995 में अपर निदेशक स्तर के पद से सेवानिवृत्त हो गये।

वह शासन के विभिन्न विभागों में अनेक नियमावलियों तथा मार्गदर्शक पुस्तिकाओं के रचयिता भी रहे। सेवानिवृत्ति के उपरान्त विश्वविद्यालय सहित अनेक महत्वपूर्ण शैक्षिक, शासकीय एवं सामाजिक संगठनों से समबद्ध तथा सेवा मामलों के विशेषज्ञ अधिवक्ता के रूप में भी सेवा दी। डॉ0 रामशरण विश्वकर्मा ने सेवानिवृत्ति के काफी समय बाद “रूबरू” नामक एक पुस्तक की रचना की जो खुद की आपबीती थी।

यादें- पिता डॉ0 रामशरण विश्वकर्मा के साथ अखिलेश मोहन व उनके पुत्र आयुष्मान मोहन
यादें- पिता डॉ0 रामशरण विश्वकर्मा के साथ अखिलेश मोहन व उनके पुत्र आयुष्मान मोहन

डॉ0 रामशरण विश्वकर्मा बहुत ही सामाजिक व्यक्ति व व्यक्तित्व के धनी थे। नौकरी में रहते हुये भी समाज के प्रति चिंतन करते रहते थे। उन्होंने तत्कालीन प्रशासनिक सेवा के अधिकारी रामायण प्रसाद विश्वकर्मा व प्रो0 डी0एन0 प्रसाद विश्वकर्मा के साथ मिलकर लखनऊ में बुद्धिजीवी सम्मेलन किया था। वह “विश्वकर्मा पांचाल ब्राह्मण सभा, लखनऊ” के पदाधिकारी भी रहे। सभा में पदाधिकारी रहने के दौरान “विश्वकर्मा रश्मि” नामक स्मारिका का प्रकाशन शुरू किया था जो अनवरत प्रकाशित हो रही है। उन्होंने लम्बे समय तक पत्रिका का सम्पादक किया। विश्वकर्मा समाज उनके योगदान को हमेशा याद रखेगा।

डॉ0 रामशरण विश्वकर्मा ने सरकारी सेवा में रहने के दौरान ही लखनऊ में अपना ठिकाना बना लिया था। सेवानिवृत्त होने के बाद विकास नगर के सेक्टर-4 में स्थाई रूप से रह रहे थे और यहीं अंतिम सांस भी ली। उनके एक पूत्र और दो पुत्रियां हैं। पुत्र अखिलेश मोहन भारतीय स्टेट बैंक में सेवा दे रहे हैं और विश्वकर्मा पांचाल ब्राह्मण सभा, लखनऊ के अध्यक्ष के रूप में सामाजिक दायित्वों का निर्वहन कर रहे हैं।

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