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अरविन्द । विश्वकर्मा । संगठन । चिन्तक । विचारक

खाली है मैदान मार लो बाजी

अरविन्द विश्वकर्मा— अकसर देखने में आया है जब कोई व्यक्ति किसी संगठन का पदाधिकारी हो जाता है तो वह अपने को बड़ा समझने की भूल करने लगता है, जबकि उसमें यह समझ नहीं होती कि उसके संगठन का ही कोई वजूद नहीं है। यदि संगठन के पास नीति, क्रांतिकारी विचार और सिद्धांत होते तो वह संगठन किसी ख्याति प्राप्त व्यक्ति को सम्मानित करके स्वयं सम्मानित होने का अवसर न खोजता रहता। जबकि होना यह चाहिए कि सम्मान पाकर सम्मानित व्यक्ति स्वयं को गौरवान्वित समझे।