You are here

‘‘सृष्टिकर्ता विश्वकर्मा का इतिहास’’ (समीक्षा)

समाज रत्न डा0 गुरूराम जी विश्वकर्मा द्वारा रचित पुस्तक ‘‘सृष्टिकर्ता विश्वकर्मा का इतिहास’’ एक ऐसा समग्र ग्रन्थ है जिसमें विश्वकर्मा समाज के गौरवशाली अतीत, संघर्षपूर्ण वर्तमान और उज्जवल भविष्य का निरूपण किया गया है।
    डा0 मधुकर ने जहां विश्वकर्मा देवता को ऋग्वेदिक काल का सर्वोच्च शक्ति सम्पन्न देवता के रूप में बड़ी सफलता से स्थापित किया है, वहीं उन्होंने विश्वकर्मा भगवान के जाति बोधक पंचमुख- मनु, मय, त्वष्टा, शिल्पी और दैवज्ञ के गौरवशाली अतीत का वर्णन करते हुयेसमस्त शिल्प जगत के कल्याण की कामना की है।
    अनेक प्रकार की भ्रान्तियों और दुष्प्रचार के मध्य विश्वकर्मा जाति के ब्राह्मण होने के विषय में काफी संदेह प्रकट किया जाने लगा था। परन्तु हमारे समाज के अग्रणी नेताओं, धर्म शास्त्रियों और प्रबुद्धजनों ने अपना कर्तव्य बड़ी निष्ठा से निभाते हुये देश के उच्चस्थ पदासीन धर्माधिकारियों से हमारे ब्राह्मण होने की लिखित सम्मति/निर्णय/व्यवस्थायें प्राप्त कर इन भ्रान्तियों को निर्मूल सिद्ध कर दिया। परन्तु देश का अधिकांश वर्ग इस विषय में अधिक नहीं जान पाया, क्योंकि विशेषकर उभरती पीढ़ी को यह विषय इतिहास के माध्यम से ही पढ़ाया जाता है और जन साधारण को इस विषय में जानने की ज्यादा रूचि नहीं होती है।
    अतः यह हमारे लिये गर्व का विषय है कि डा0 मधुकर हमारे समाज में अग्रणी इतिहासकार के रूप में उभर कर आये हैं। इन्होंने अपनी पुस्तक में वेदों से लेकर वर्तमान काल की काका कालेलकर रिपोर्ट और मण्डल कमीशन रिपोर्ट का गहन अध्ययन कर विवेचना प्रस्तुत किया है। डा0 मधुकर द्वारा दिये गये सुझाव राष्ट्रीय महत्व के हैं। गहन अध्ययन, चिन्तन, मनन पर आधारित यह मौलिक एवं प्रभावशाली कृति निश्चय ही राष्ट्र और समाज को एक नई ऐतिहासिक दृष्टि एवं दिशा प्रदान करेगी।
    डा0 मधुकर की पुस्तक में सैंधव सभ्यता, का वर्णन विश्वकर्मा समाज के लिये बड़ा प्रासंगिक एवं महत्वपूर्ण है। यह विश्वकर्मा समाज का गौरवशाली अतीत, इतिहास एवं कला का अनूठा प्रमाण है। इस काल के अवशेषों में अनेक शिवलिंग पाये गये हैं। शिव को परम्शिव (विराट विश्वकर्मा) से पृथक करना असम्भव है। गणेश परिवार शिव परिवार का एक अंश है। गणेश पत्नियां बुद्धि और सिद्धि विश्वरूप (विश्वकर्मा पुत्र) की कन्यायें थीं। परन्तु अन्य साहित्यकार सैंधव सभ्यता में विश्वकर्मा के स्वरूप को नहीं पहचान पाये। अतः समाज के इतिहासकार डा0 मधुकर द्वारा दिखाये मार्ग पर आगे बढ़ना होगा।
    सैंधव सभ्यता के भग्नावशेषों के निरीक्षण से विश्व के इतिहासकार हैरान हैं कि वे लोग कौन थे जिन्होंने भवन निर्माण, वास्तुकला और नगर रचना में इतनी उच्चकोटि की दक्षता का प्रदर्शन कर सदा के लिये चले गये और वे कहां चले गये। इन अवशेषों में ढेर सारेशिवलिंग मिले हैं, देवी की मूर्ति है। नारी की भी मूर्ति है, जो आज की तरह सिर की मांग में सिंदूर लगाये हुये हैं। इनमें सबसे महत्वपूर्ण प्राप्ति स्वास्तिक चिन्ह की है जो प्रगति और कल्याण का संदेश देता है। यह ऋग्वेदीय विचारधारा है। ऋक का एक अर्थ गति है- गति ही धर्म है, जड़ता पाप है। एक अनुमान यह भी है कि सैंधव सभ्यता के ये लोग दक्षिण की तरफ समुद्र के रास्ते चले गये होंगे। परन्तु प्रसिद्ध इतिहासकार, अन्वेषक एवं भारत के पुरातत्व विभाग के पूर्व महानिदेशक डा0 लाल के अनुसार ये सरस्वती नदी सभ्यता के पोषक के रूप में आजकल पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, गुजरात और यमुना के तटवर्ती प्रदेशों में बसे हुये हैं। पूर्व काल में सरस्वती नदी भारत के दक्षिण-पश्चिम की ओर बहते हुये सिन्धु नदी के पूर्वी मुहाने से मिलकर पश्चिमी सागर में जा मिलती थी। अतः वेदों में सिन्धु आदि नदियों के सरस्वती नदी में मिलना बताया गया है। सरस्वती नदी कुरूक्षेत्र पेहोवा सिरसा के मार्ग (वर्तमान घग्घर) से बहते हुये द्रषद्वति नदी (वर्तमान चैतांग) को सूरत गद के निकट समेटते हुये सिन्धु नदी के पूर्वी मुहाने से पश्चिम सागर में जा मिलती थी। हिमालय में शिवालिक पहाडि़यों से सरस्वती का निकास अधबदरी के स्थान पर था। हिमग्लेशियर के बारह मास पानी मिलने के कारण यह सतत बहती रहती थी। परन्तु भूकम्पीय परिवर्तनों ने अधबदरी निकास से ऊपर बाटा मरकन्डा के स्थान पर यमुना नदी में मिला दिया और यह बारह मासी नदी बरसाती नदी बन कर घग्घर के रूप में प्रसिद्ध हुई।
    स्वायम्मुव मनु (आदि मनु) काल (पहला मन्वन्तर), से छठा मन्वन्तर (चाक्षुस) काल तक का समय विश्वकर्मामय रहा है, इसे आदिकाल भी कह सकते हैं। विकास उनमुख सतयुगी विश्वकर्मा काल में प्रजा कार्य कुशलता के आधार पर अपनी जाति (वृति कर्म) का वर्णन करते थे। अतः द्विज जाति में विशेषकर ब्राह्मण और क्षत्रिय में वंश भेद बहुत कठिन था, यही कारण है कि आज भी यह लोग समान गोत्र/निकास धारण किये हुये हैं। विश्वकर्मा देव-असुर के भेद से भी ऊपर थे।
    आदि मनु के दोनों पुत्रों- प्रियवर्त और उत्तानपाद का विवाह विश्वकर्मा परिवार में हुआ था। राजा प्रियवर्त की पत्नी विश्वकर्मा कन्या बर्हिष्मति थी और राजा उत्तानपाद की पत्नी (ध्रुव माता) सुनिति प्रभास वसु की बहन थी। ध्रुव वंश में सुश्रेष्ठ मानव सभ्यता के प्रवर्तक राजा पृथु थे, उनके पिता राजा वेन जैन धर्म से प्रीाावित थे, जिनकी हत्या अर्थववेदीय मन्त्रों द्वारा की गयी थी।
    प्रियवर्त वंश में उनके प्रपौत्र महाराणा ऋषभ (आठवें अवतार) जैन धर्म के प्रवर्तक पहले तीर्थांकर थे। प्रसिद्ध पूज्य गणिनी अर्थिका शिरोमणि ज्ञानमती माता जी ने अपनी पुस्तक जैन भारती में इस बात का उल्लेख किया है कि उस काल में भगवान ऋषभ देव को विश्वकर्मा, धाता, विधाता कहा जाता था। उन्होंने इस पुस्तक में यह भी लिखा है कि स्थपति (राजमिस्त्री) राजा के सात जीव रत्नों- पटरानी, सेनापति, गृहपति, पुरोहित, स्थपति, गज, अश्व में से एक माना जाता था। महाराजा ऋषभ देव के उत्तराधिकारी उनके पुत्र राजा भरत का विवाह विश्वकर्मा, देवपुरोहित विश्वरूप की कन्या पंचजनी से हुआ था। पुराणों के मतानुसार इन्हीं भरत के नाम से अजनाभ देश/हिमवर्ष का नाम भारत पड़ा था। भरतवंश की बीसवीं पीढ़ी के आस-पास विश्वकर्मा वंशधर धीमान और भौवन का जन्म हुआ था। भौवन पुत्र त्वष्टा (विरोचना/प्रह्लादी पति) में बीस पीढि़यों से ज्यादा का अन्तर है, जो एक शोध का विषय है। त्वष्टा पुत्र विरज के विषय में यह प्रसिद्ध है कि जिस प्रकार भगवान विष्णु देवताओं की शोभा बढ़ाते हैं उसी प्रका प्रियवर्त वंश को सबसे पीछे हुये राजा विरज ने अपने सुयश से विभूषित किया।
    राजा ध्रुववंशीय पृथु पिता राजा वेन के सगे सम्बन्धी प्रियवर्त वंशीय महाराजा ऋषभ से प्रभावित होना और जैन धर्म प्रवर्तक प्रथम तीर्थांकर ऋषभ का दक्षिण में जाकर निर्वाण प्राप्त करना इस बात का संकेत देता है कि यह विश्वेदेव दक्षिण की ओर भी विस्थापित हुये थे। यही नहीं बुद्ध धर्म भी विश्वेदेवों से प्रभावित रहा और अजंता-एलोरा की मुख्य गुफा विश्वकर्मा के नाम से जानी जाती है। अतः ऐसा अनुमान है कि पुराणों और बाल्मीकि रामायण में वर्णित विश्वकर्मा राजवंश जैन और बौद्ध धर्म में विलुप्त हो गया था। वर्तमान खाती (जांगिड़/जांगड़ा) समाज का सम्बन्ध सिन्धु नदी की पश्चिमी सहायक नदियों से तो रहा है परन्तु इनके वहां से विस्थापित होकर आने का कारण ज्ञात नहीं है। वर्तमान पाकिस्तान के उत्तर-पश्चिमी सीमांत प्रदेश (NWFP) के ऐबटाबाद जिले में ब्लाक स्तर का शहर ‘‘झांगड़ा’’ (JHANGDA) अब भी आबाद है। यह शहर 3410N (अक्षांश) और 7308E (देशान्तर) रेखा (Latitude/Longitude) पर स्थित है। इण्टरनेट साइट विकपीडिया के अनुसार वर्तमान खाती (जांगिड़/जांगड़ा) का निकास यहीं से हुआ है। खाती राजपूत और तरखान दोनों जातियों में समाविष्ट है और विश्वकर्मा को वैदिक ब्राह्मण माना है। नासिक गुहा लेख के अनुसार गौतमी पुत्र शतकर्णि ने ईसा शताब्दी के आरम्भ से कुछ साल पहले खतिय जाति का मान-मर्दन किया था। शालवाहन वंश ब्राह्मण हैं या क्षत्रिय यह विवादास्पद है। (पुस्तक में कठिक शब्द की जगह त्रुटिवश खटिक छप गया है। कृपया इसे सुधार कर पढ़ें और लेखक भी इधर ध्यान दें)
    विरासत में जो नाम हमें मिले हैं इनमें कुछ तो इतिहास छिपा ही होगा। कुछ लोग जांगड़ा शब्द को जांगिड़ शब्द का अपभ्रंश मानते हैं, परन्तु जहां जांगड़ा हमारे समाज का सामूहिक निकास बताता है वहीं जांगिड़ वंश परम्परा का द्योतक है और रथकार ब्राह्मण होने का प्रमाण देता है। मुख्य रथकार को रत्निन की संज्ञा दी जाती थी। ये राज्य परिषद के सदस्य होते थे जिनकी अनुमति से नया राजा राजसूय यज्ञ द्वारा राज सिंहासन ग्रहण करता था और भगवान विश्वकर्मा का आशीर्वाद प्राप्त किया जाता था। कुछ लोग खाती शब्द को निरर्थक मानते हैं। लोग हैरान होते हैं कि यह शब्द क्यों हमारे नाम से जुड़ा, कुछ इसकी उत्पत्ति संस्कृत भाषा के खात (गढ़ा) शब्द से निकालते हैं। जो भी हो इस विषय में आगे जानना आवश्यक है। परन्तु मत्स्य पुराण के अनुसार मय और ख्याति दोनों शब्द पराशर वंश में गोत्र के रूप में हैं। नील पराश के नाम पांच प्रसिद्ध गोत्र हैं- प्रपोहय, ब्रह्यमय, ख्यातैय, कौटिजाति और हर्य शिव।
    डा0 मधुकर द्वारा रचित पुस्तक ‘‘सृष्टिकर्ता विश्वकर्मा का इतिहास’’ में मय की पत्नी सुलोचना पराशर मुनि की कन्या बताया गया है। किन परिस्थितियों में मयवंश को पराशर वंश की शरण लेनी पड़ी यह जानना आवश्यक है। संकट काल में बहन, भाई से सहायता की अपेक्षा तो करती ही है। खाती (ख्यातैय) पराशर वंश में शरणदाता थे या वे भी मय वंश की तरह शरणागत थे यह भी शोध का विषय है।
    आशा है कि अनेक ऐसे महत्वपूर्ण विषयों पर आधारित डा0 गुरूराम मधुकर जी की कृति ‘‘सृष्टिकर्ता विश्वकर्मा का इतिहास’’ समाज को एकीकृत करने का पुण्य प्रयास में सफल होगी।
    इस पुस्तक की सर्वग्राह्यता एवं सफलता की हार्दिक कामना करता हूं।

-लक्ष्मी चन्द्र असलिया
शोध सर्वेक्षक एवं समीक्षक
‘‘सृष्टिकर्ता विश्वकर्मा का इतिहास’’
मकान नं0-460, सेक्टर-31
गुणगांव (हरियाणा)
मो0ः 09335595850