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जय (शिव) विश्वकर्मा- हैं ब्राह्मण पांचाल, तो क्यों हैं बेहाल

मिल नहीं सकती उसे तबाही से निजात।
    जिसने बर्बाद बुजुर्गों की निशानी कर दी।।
    लीक-लीक तीनों चले, कायर, क्रूर, कपूत।
    लीक छाडि़ तीनों चले, शायर, सिंह, सपूत।।
    विभिन्न शास्त्र पुराणों से सत्यापित मान्यता है कि जगद्गुरू विश्वकर्मा (हिन्दू, सिख, इसाई, मुसलमान, सभी पूजते विश्वकर्मा भगवान।) में ब्रह्मा, विष्णु, महेश, कृष्ण, बृहस्पति की आध्यात्मिक शक्ति है। आध्यात्मिक साधक के लिये कुछ भी असम्भव नहीं है। क्योंकि-
    जो बात दवा से न हो सके, वो बात दुआ से होती है।
    जब काबिल मुर्शिद मिल जाये तो बात खुदा से होती है।।
    वशिष्ठ शास्त्र के अनुसार- ‘‘माघ शुक्ले त्रयोदश्यां दिवा पुण्ये पुनर्वसौ। अष्टांविशति यें जातः विश्वकर्मा भवानि च।।’’
    अर्थात- हमारे भगवान ‘‘भावी मेटि सकहूं त्रिपुरारी’’ भी है तो अधिसंख्य फटेहाल क्यों?
    आज सारा जगत आध्यात्मिक उर्जा प्राप्ति हेतु आराधना कर रहा है। हम भी पीछे नहीं हैं। हमने कभी सोचा कि अन्य में खरगोश चाल है तो हमारे में कच्छप क्यों? क्या हम समाजोत्थान हेतु ध्यानरत हैं? या पद प्रतिष्ठा प्राप्ति हेतु कूटरचित वाद प्रस्तुत कर विघटन करने हेतु या पूर्वजों द्वारा मन्दिर को प्राप्त अचल सम्पत्ति पर कब्जा करने हेतु।
    दायित्व बोध के बिना (संघे शक्ति कलयुगे) भाषण बाजी करना कोरा बकवास होता है। यह सब अब अच्छा नहीं लगता कि आइये माला पहनिये, भाषण दीजिये और चले जाइये। यह श्रोतागण (अनुयायीगण) का मात्र दुरूपयोग व अपमान प्रतीत होता है। अतः शीर्ष नेतृत्वगण (ढेर जोगी मठ उजाड़) से अब हमारी अपेक्षा हो गयी है कि वह एक मंचीय होकर हमें निर्देश दें कि क्या करना है, और स्वयं करके दिखायें भी, तभी हमारी सार्थकता है। अन्यथा ‘‘अब लौ नसानी-अब न नसइहौ’’ के मार्ग पर हम चलने को मजबूर होंगे जिसकी जिम्मेदारी नेतृत्व की होगी। ध्यान रखिये-
    1. बिखर जाती हैं वे कौमें जिन्हें रहबर नहीं मिलता
    2. खुदा ने आज तक उस कौम की हालत नहीं बदली।
      जिसे खुद ही न हो एहसास, हालात बदलने की।।
    अतः ‘‘जुल्म भी सहना, दुआ भी देना, वो बेबसी का गया जमाना। अगर हो हिम्मत गिरा दो बिजली, बना रहे अपना आशियाना।।’’ की तर्ज पर राजनीतिक संघर्ष करना पड़ेगा।
    जैसी करनी वैसी भरनी के अनुसार सामाजिक शक्ति का एकीकरण नहीं हो सका, क्योंकि हम भूल गये कि-
    सूई से लो प्रेरणा, दो को करती एक। (सामाजिक)
    कैंची से क्या सीखना, जिसको नहीं विवेक।। (राजनीति)
    कहा गया है कि- ‘‘रोटी देके जोड़े-पैसा लेके तोड़े’’
    है वही सूरमा इस जग में, जो अपना राह बनाते हैं।
    कुछ चलते पद चिन्हों पर, कुछ पद चिन्ह बनाते हैं।।
    यदि रविवार को दैनिक समाचार पत्रों में वैवाहिक विज्ञापन पढ़ें तो हमारे सामाजिक शक्ति का प्रदर्शन स्पष्ट दिखाई पड़ता है, जिसमें ‘जाति बन्धन नहीं’ लिखा होता है। यह कार्य समाज के आर्थिक, बौद्धिक, स्वस्थजन द्वारा किया जा रहा है। जो सिद्ध करता है कि हम ब्राह्मण पांचाल होते हुये भी किसी के मानसिक गुलाम आज भी हैं। जो परगोत्रीय रोटी खाते हैं वे सशक्त हैं। हम लीक से हट नहीं पाये तो स्वयं उत्तर खोजिये। अतः सूरमा, सपूत बनने का संकल्प लें तभी शक्ति बढ़ेगी।
    वशिष्ठ पुराण के अनुसार ‘‘वाचस्पति विश्वकर्माऽमूदिति’’ अर्थात् गुरू ही नहीं जगद्गुरू हैं। आज हम उनसे ज्ञान व शिव से वरदान प्राप्त करें कि कल से हमारी स्थिति विकसित समाज समतुल्य हो। सतर्क रहिये-
    शिवद्रोही मम दास कहावै। सो नर मोहि सपनेहु नहि भावै।।
    हर गुरू निन्दक दादुर होई। सहज जनम नर पाव तन सोई।।
    एकै साधे सब सधे, बहु साधे सब बह जाय।
    साध शिव गुरू विश्वकर्मा को, सभी क्लेश मिट जाय।।
    अतः- साध विश्वकर्मा! साध विश्वकर्मा! साध विश्वकर्मा!
                .....जय विश्वकर्मा!
धृष्टता व त्रुटियों के लिये क्षमा प्रार्थी
-मेवालाल विश्वकर्मा
निकट अस्पताल, अहरौरा
जनपद- मिर्जापुर 231301
मो0: 09453090811