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kamlesh's blog

अभी और कितने खण्ड होगी अखिल भारतीय विश्वकर्मा महासभा..?

यह सवाल साधारण नहीं, बहुत ही दु:खद व चिन्तनीय है। अखिल भारतीय विश्वकर्मा महासभा के संस्थापक रहे स्व0 मिहिर चन्द धीमान और स्व0 गोस्वामी दास की आत्मा भी महासभा को खण्ड—खण्ड होती देख अशान्त हो रही होगी। उन लोगों ने कभी सपने में भी नहीं सोचा रहा होगा कि जिस संगठन को वह अपने खून—पसीने से सींच रहे हैं, उनकी सन्तानें उसकी दुर्दशा देखेंगे। मुझे मिहिर चन्द धीमान के परिजनों के बारे में तो कोई जानकारी नहीं है, परन्तु गोस्वामी दास के पुत्र गणेश दत्त शर्मा के बारे में जानता हूं। करीब तीन साल पहले उनसे इलाहाबाद के एक कार्यक्रम में मुलाकात हुई थी। वह महासभा के नेताओं द्वारा स्वयं की उपे

जिम्मेदारी का 18वां वर्ष

यह तो पाठकों और शुभचिन्तकों के शुभाशीष का परिणाम है कि पिछले 17 वर्षों में तमाम उतार—चढ़ाव तथा प्रकाशन में आये विषम आर्थिक संकट के बाद भी 'विश्वकर्मा किरण' अपनी जिम्मेदारियों से पीछे नहीं हटा। अब प्रकाशन का 18वां वर्ष लगा है जो मनुष्य के जीवन का महत्वपूर्ण माना जाता है, ऐसे में जिम्मेदारी भी बड़ी हो जाती है। वैसे तो मुझे पत्रकारिता करते करीब 20 वर्ष हो गये और पत्रिका प्रकाशन के भी 17 वर्ष पूरे हो गये। 18वें वर्ष में प्रवेश की सुखद अनुभूति के साथ ही पिछली जिम्मेदार

सर्वधर्म समभाव का प्रतीक है विश्वकर्मा पूजा

17 सितम्बर को मनाया जाने वाला विश्वकर्मा पूजा सिर्फ पूजा ही नहीं, सर्वधर्म समभाव का प्रतीक भी है। भगवान विश्वकर्मा ही एक ऐसे देवता हैं जिनकी पूजा पूरे विश्व में होती है और सभी जाति-धर्म के लोग करते हैं। इसलिये विश्वकर्मा पूजा को पूरे विश्व में सर्वधर्म समभाव का प्रतीक व भाईचारे का सन्देश माना जाता है। 17 सितम्बर को विश्वकर्मा पूजा क्यों मनाया जाता है?

उत्तर प्रदेश में अब नहीं होगी 'भगवान विश्वकर्मा' की पूजा

उत्तर प्रदेश के अन्दर अब 'भगवान विश्वकर्मा' की पूजा नहीं होगी। पूजन के लिये अखिलेश यादव की समाजवादी सरकार एक लाख 'आधुनिक विश्वकर्मा' बनाने जा रही है। अब तक मुख्यमन्त्री अखिलेश यादव ने 25 लोगों को 'आधुनिक विश्वकर्मा' का प्रमाणपत्र दे भी दिया है। जब प्रत्यक्ष 'आधुनिक विश्वकर्मा' की पूजा करने को मिल जाये तो पुरातन आदिदेव 'भगवान विश्वकर्मा' की मूर्ति अथवा फोटो की पूजा करने की क्या आवश्यकता है?

चैटिंग ने उड़ाई किशोरों की नींद नम्बर भी कम आने लगे

टेक्नोलाजी ने एक तरफ जहां लोगों की जिंदगी आसान बनाई है वहीं दिन-ब-दिन बढ़ते स्मार्ट फोन के उपयोग ने किशोरों की सेहत और भविष्य को दांव पर लगा दिया है। फेसबुक, व्हाट्सएप्प, इंस्टाग्राम और अब तो स्नैपचैट ने टीनेज की रातों की नींद उड़ा दी है। मोबाइल क्रांति जब आई, तो लगा कि एक दूसरे से दूर रहकर भी जुड़ने का मौका मिला। आप किसी भी शहर में रह रहे हों, यह एक जरिया बना अपनों का हाल-चाल जानने और उनसे जुड़े रहने का। मगर इससे रिश्ते सलामत हैं, कहना मुश्किल हैं।

17वें बसन्त की दहलीज पर ‘‘विश्वकर्मा किरण’’

16 बसन्त कैसे बीत गये, कितना उतार-चढ़ाव रहा कुछ पता ही नहीं चला। फिलहाल संघर्ष की यह गाड़ी 17वें बसन्त की दहलीज पर है। 17वें वर्ष का पहला अंक आपके हाथ में है। ‘विश्वकर्मा किरण’ हिन्दी साप्ताहिक पत्रिका भले ही उत्तर प्रदेश के जौनपुर जनपद से प्रकाशित हो रही है, परन्तु इसकी पहचान अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर हो चुकी है। विदेशों में रहने वाले अपने लोग वेबसाइट पर आनलाइन पत्रिका पढ़ते हैं और ई-मेल के जरिये प्रसन्नता व्यक्त कर शुभकामनाएं भेजते हैं। प्रकाशन के शुरूआती दिनों से ले

आजादी की अवमानना

15 अगस्त, 1947 के पहले का वह दौर जब अंग्रेजी हुकूमत के विरूद्ध जुबान से एक भी शब्द निकलने पर उसके शरीर पर कोड़ों की बरसात होती थी। किसी की हिम्मत नहीं होती थी कि शासक व नियमों के विरूद्ध अपनी आवाज बुलन्द कर सके। गुलामी की ऐसी जंजीरों में बंधे हिन्दुस्तान में लोकतन्त्र की बहाली के लिये अनगिनत लोगों ने अपनी कुर्बानी दे दी। उन शहीदों की कल्पना थी कि उनकी कुर्बानी से देश में लोकतन्त्र बहाल हो जायेगा तो देश खुशहाल होगा और देश का अपना अलग संविधान होगा। हुआ भी वही। अनगिनत

विलुप्त होते वंश परम्परागत कारीगर

प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी ने लोकसभा में दिये गये अपने पहले भाषण में ‘फाइव टी’ टैलेंट (प्रतिभा), ट्रेडिशन (परंपरा), टूरिज्म (पर्यटन), ट्रेड (व्यापार) और टेक्नोलॉजी (तकनीक) को बढ़ावा देने की बात कही थी। इन सब पर अमल भी हो रहा है परन्तु इसमें ‘ट्रेडिशन’ पर कोई अमल नहीं हुआ है। ट्रेडिशन का मतलब ‘परम्परागत’ होता है। हमें लगता है कि प्रधानमन्त्री का वह भाषण सिर्फ लोकसभा की चहारदीवारी तक ही सीमित रह गया है। यदि वह आगे भी बढ़ा है तो उसका लाभ ‘गैर परम्परागत’ को मिल रहा है।

संघर्ष और सफलता के पन्द्रह वर्ष

संघर्ष की गाड़ी पर सवार होकर ‘विश्वकर्मा किरण’ परिवार ने प्रकाशन के पन्द्रह वर्ष पूरे कर लिये हैं। प्रकाशन के सोलहवें वर्ष का प्रथम अंक आपके हाथ में है। 6 दिसम्बर, 1999 को विश्वकर्मा किरण का पहला अंक चार पेज के समाचार पत्र के रूप में प्रकाशित हुआ था जो आज पत्रिका की शक्ल में आपके सामने है। इन पन्द्रह वर्षों के बीच कई ऐसे मोड़ आये जब प्रकाशन बन्द होने के कगार पर पहुंच गया पर समाज के कुछ शुभचिन्तकों ने सहयोग कर प्रकाशन को निरन्तरता प्रदान किया।

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