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खाली है मैदान मार लो बाजी

अरविन्द विश्वकर्मा— अकसर देखने में आया है जब कोई व्यक्ति किसी संगठन का पदाधिकारी हो जाता है तो वह अपने को बड़ा समझने की भूल करने लगता है, जबकि उसमें यह समझ नहीं होती कि उसके संगठन का ही कोई वजूद नहीं है। यदि संगठन के पास नीति, क्रांतिकारी विचार और सिद्धांत होते तो वह संगठन किसी ख्याति प्राप्त व्यक्ति को सम्मानित करके स्वयं सम्मानित होने का अवसर न खोजता रहता। जबकि होना यह चाहिए कि सम्मान पाकर सम्मानित व्यक्ति स्वयं को गौरवान्वित समझे। 
कथित पदाधिकारी को यह भी समझ नहीं आता कि यदि वह अपने संगठन से संतुष्ट है, उसके विचारों से प्रेरित है, उसकी नीतियों का प्रसारक है तो वह अन्य उसी के समानान्तर कार्यक्रम में क्यों गया? जब कोई संगठन, संगठन की स्थिरता, भविष्य, विचारों की क्रांति के लिए मीटिंग या कार्यक्रम का आयोजन करते हुए लोगों को बुलाता है तो वहां अन्य संगठन के पदाधिकारी भी चले जाते हैं क्यों? क्या करने गए? क्या जासूसी करने गए या अन्य लोगों के समूह या सम्बन्धित संगठन को भ्रमित करने के लिए गए? जो कदापि उचित नहीं! मैं नही समझता कि जबतक व्यापक जनहित की बात न हो तबतक केवल कुछ होगा कि उम्मीद में पदाधिकारी होकर अन्य कहीं जाना उचित है। यह आना—जाना अपने संगठन के उच्च पदाधिकारियों के संज्ञान में लाकर पूरी ताकत के साथ भागीदारी के रूप में हो तभी उचित है और उसी को ही सहयोग कहेंगे अन्यथा भटकना कहते हैं। अफसोस उन संगठनों पर होता है जो ऐसे अनुशासनहीन पदाधिकारियों पर अंकुश लगाने में असफल होते हैं। जहां अनुशासन नहीं, वहां जुड़ाव नहीं बिखराव होता है। यही वह कारण है कि कोई संगठन समाज के विकास में स्वयं को स्थापित नहीं कर पाया और न वह ख्याति प्राप्त किया जिसके साथ जुड़ाव के साथ लोग अपने को सौभाग्यशाली समझें।
समाज, समाज के लोगों से ही बनता है। समाज के लोगों के आर्थिक, सामाजिक, शैक्षिक रुप से सक्षम होने के साथ ही राजनैतिक पहचान उसमें चार चांद लगाती है। किसी भी समाज का निर्माण उसके सबसे छोटे सदस्य व सबसे बड़े सदस्य के संस्कारों, उनके कौशल, उनके पराक्रम, उनके योगदान के फलस्वरूप होता है। आज समाज को चिंतक, विचारक, लेखक चाहिए जो समाज के लिए सकारात्मक सन्देश दे सकें। निष्पक्ष रूप से वास्तविकता लिख सकें, भविष्य के लिए चिंतन मनन कर सकें, लेकिन दुर्भाग्य कि कथित संगठन इस ताकत को नहीं पहचानते।
समाज के विकास के लिए हमें सर्वप्रथम प्रत्येक परिवार को रोटी कपड़ा मकान की मूलभूत जरूरत को पूरा करते हुए आगे बढ़ाना होगा। समाज का प्रत्येक व्यक्ति शिक्षित, गुणवान व सभी समस्याओं को पीछे करके आगे बढ़ने की क्षमता वाला हो यही संगठन की जिम्मेदारी है। वैसे तो समाज में सदैव कुछ ना कुछ त्याग करने वाले लोग आते रहे हैं और उसे झकझोर कर नींद से जगाने का कार्य करते रहे हैं किन्तु ठोस नीतियों के अभाव में उन्हें वह सफलता नहीं मिली जिसके वे हकदार थे। अतः मेरा मानना है कि प्रत्येक व्यक्ति को अपना भाग पूरा करना ही होगा। प्रत्येक व्यक्ति को हमारा इतिहास पता होना चाहिए, प्रत्येक व्यक्ति को उद्यमी व जरूरत से ज्यादा आर्थिक उपलब्धि हो इसका मार्ग प्रशस्त करना होगा और जो समय को बचाकर अन्य को प्रेरित कर सके और ऐसे अवसर के लिए ही संगठनों की व्यापक नीतियों की जरूरत होती है। अगर हम कोई मिशन बनाकर इन सब में सक्षम नहीं हुए तो 'मुंगेरीलाल के हसीन सपने' जैसा समाज का विकास होता रहेगा और आज से पहले आने वाले आज हम/आप और कुछ दिन बाद आने वाली पीढियां भी इसी मंजिल से आती—जाती रहेंगी, लेकिन समाज का विकास दूर की कौड़ी ही साबित होगा।
जब हमारे यहां एक बच्चे के रूप में खुशियां आती हैं तो लोग कहते हैं एक मिस्त्री का घर और बढ़ गया, ऐसा क्यों? समय के परिवर्तन के साथ हम लोगों के दिमाग में यह बात क्यों नहीं डाल पा रहे और हम इसलिए क्यों नहीं तैयार हो पा रहे हैं कि वह कहें कि 'नेता' पैदा हुआ, एक 'अधिकारी' और बढ़ गया एक 'व्यवसाई' और बढ़ गया।
मैं सभी संगठनों से चाहता हूं कि समाज की पूर्ण ऊर्जा का दोहन होना ही चाहिए और उसको ही आधार बनाकर हमें सभी दिशाओं में कीर्ति फैलाना होगा जिसके लिए सर्वप्रथम संगठन की रणनीत, कार्य करने की शैली, क्या—क्यों—कैसे होगा का समावेश, उससे कब—कैसे क्या मिलेगा और निश्चित समय अंतराल पर उसका आकलन करना होगा। वैसे तो विश्वकर्मा समाज की संख्या देश में 10 प्रतिशत से अधिक है और जिस दिन समाज का प्रत्येक सदस्य उठ खड़ा होगा और एक दूसरे के सुख—दुःख को अपना समझने लगेंगे, उसी दिन मैं यह मानूंगा कि समाज का वास्तविक विकास हुआ।
बहुतेरे लोगों को सुना कि लोगों को राजनीति करनी चाहिए लेकिन राजनीति के लिए वह निर्भीकता, कौशल तथा साम-दाम-दंड-भेद का ज्ञान देने से पहले ही ऐसे उपदेशक मंचासीन होकर अपनी भाषणबाजी का लंबा सा खाली लिफाफा पकड़ाकर चल देते हैं। क्योंकि वे राजनीति करवाना नहीं स्वयं करना चाहते हैं। वर्तमान में गांव की स्थिति में इतना परिवर्तन नहीं हुआ है कि हम सामान्य वर्ग के सामने खड़े होकर ताव से बोले मैं भी चुनाव लड़ूंगा और जीत कर दिखाऊंगा। आज भी यदि किसी व्यक्ति को थाने तक जाने की भी जरूरत होती है तो कुछ अपवादों को छोड़ दें तो बाकी तो यह भी आश्वासन नहीं देते कि तू चल मैं आता हूं। कैसे होगा समाज का विकास? स्पष्ट है मुझे नीति का निर्धारण करना होगा जिसमें समाज की जरूरत, विकास के हिसाब से वह सब देना होगा जो आवश्यक है।
लगभग सभी मीटिंगों में कुछ लोग आकर अपने अतीत का वर्णन करने लगते हैं। उन्हें यह नहीं पता होता कि आज लोग नए विचारों, नई क्रांति के लिए बैठे हैं। वे नए विचारों का स्वागत नहीं कर पाते, नए लोगों को सुनना नहीं चाहते, केवल अपने अतीत के कुंठित विचारों को रद्दी की भांति परोस कर इतिश्री करने में ही समाज सेवा समझने की भूल कर बैठते हैं। मैं तो उन कुंठित/असफल लोगों से कहना चाहता हूं कि यदि उद्देश्य अतीत से सबक सिखाना है या इतनी नफरत किसी से है तो छपवा दो पत्र-पत्रिकाओं में, छपवा दो बैनर पोस्टर और लगा दो गली—गली नुक्कड़ नुक्कड़ चौराहों पर।
अंततः यह कहने में कोई संकोच नहीं कि कोई ऐसा संगठन नहीं जो पूरे देश के लिए सुनहरे सपने बुन चुका हो, स्पष्ट है मैदान खाली है, खिलाड़ी हो तो बाजी मार लो।
लेखक— अरविन्द विश्वकर्मा, लखनऊ (स्वतंत्र चिन्तक एवं विचारक)