सामाजिक एकता व विकास में बाधक लोहार-बढ़ई के संगठन

जी हां, यह बात कड़वी जरूर है पर सच है। देश में बने लोहार और बढ़ई के संगठनों ने विश्वकर्मा समाज की सामाजिक एकता व विकास में बाधा पहुंचाने का काम किया है। आज जब पूरे देश में ‘विश्वकर्मा’ के नाम पर एक ताकत बनाने की बात होती है तो उसमें लोहार-बढ़ई करने वाले लोग अपना हित साधने में लग जाते हैं। ऐसे लोग कतई समाज के हितैषी नहीं हो सकते। मैं नहीं कहता कि आप संगठन न बनाइये, एक नहीं, हजार संगठन बनाइये परन्तु उद्देश्य साफ होना चाहिये कि यह संगठन ‘विश्वकर्मा’ के नाम पर विश्वकर्मा समाज के हित में काम करेगा। लोगों को यह नहीं भूलना चाहिये कि विश्वकर्मा ही हमारी पहचान और ताकत है। विश्वकर्मा समाज के जितने भी संगठन हैं चाहे वह विश्वकर्मा के नाम पर बने हों, शिल्पकार के नाम पर बने हों, लोहार के नाम पर बने हों या फिर बढ़ई के नाम पर बने हों, सभी के उद्देश्यों में राजनीतिक उद्देश्य जरूर छिपा होता है। सभी की मांग होती है कि उन्हें राजनीतिक भागीदारी दी जाय। लोग राजनीतिक भागीदारी की बात तो करते हैं परन्तु जिस ताकत की बदौलत भागीदारी मिल सकती है, उस ताकत को बनाने की बात कोई नहीं करता। सम्पूर्ण विश्वकर्मा समाज अन्दर से बहुत मजबूत है और एक भी है, उसे कमजोर करने का काम निजी स्वार्थ में बने लोहार और बढ़ई के संगठन कर रहे हैं। यही कमजोरी हमें शासन-सत्ता से भी दूर किये हुये है। विभिन्न संगठनों के अध्यक्ष और पदाधिकारी एक दूसरे के साथ उठना-बैठना तक पसंद नहीं करते। उनका घमण्ड उन्हें साथ नहीं खड़ा होने देता। लोगों की आपसी संवादहीनता और दूर कर दे रही है।
दूरी सिर्फ लोहार-बढ़ई में ही नहीं, लोहार की लोहार से और बढ़ई की बढ़ई से भी दूरी है। यह दूरी सिर्फ खुद के बनाये हुये संगठन के नाम पर है। खुद बनाया संगठन लोगों को इतना घमण्डपूर्ण बना दिया है कि जैसे उन्होंने संगठन बनाते ही सबकुछ हासिल कर लिया है। बाद में पता चलता है कि उनके हाथ तो कुछ भी नहीं लगा। ऐसे संगठन समाज के लोगों को गुमराह करके अपने साथ जोड़ने का प्रयास करते हैं। समाज का व्यक्ति यदि किसी संगठन से जुड़ गया तो दूसरे संगठन के लिये जैसे वह दुश्मन हो जाता है। ऐसी स्थिति में समाज के व्यक्ति का नुकसान भी हो जाता है। यह स्थिति सिर्फ नासमझी के कारण होती है।
विश्वकर्मा समाज के सभी वर्गों के लोगों को ‘‘विश्वकर्मा’’ के नाम पर एकजुट होकर एक ताकत बनाने की आवश्यकता है। विश्वकर्मा शब्द की पहचान पूरे देश में है। विश्वकर्मा के नाम पर ताकत बनेगी तो शासन-सत्ता में बिन मांगे भागीदारी मिल जायेगी। लोहार का संगठन बनाकर लोहार को भागीदारी, बढ़ई का संगठन बनाकर बढ़ई को भागीदारी देने की बात करते हैं, उन्हें विश्वकर्मा समाज को भागीदारी की बात करनी चाहिये। लोहार-बढ़ई के नाम पर आपस में नफरत फैलाने वालों को समाज के लोगों को करारा जवाब देना चाहिये। हमारे एक ही ईश्वर ‘विश्वकर्मा’ हैं और हमारी पहचान व ताकत ‘विश्वकर्मा’ है।

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