आइए हम सब मिलकर सामाजिक एकता की नई गाथा लिखें

विश्वकर्मा वंशीय समाज के लोग कितने भोले होते हैं, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि प्रत्येक राजनैतिक दल का मुखौटाधारी व्यक्ति समाज के नाम पर धोखा देता रहा है। समाज की भावनाओं से ऐसे खेलता है जैसे कि वह स्वयं ठग लिया गया हो और बदला लेने की नीयत से अगले को ठग रहा हो। वह जानता है कि उसकी नैतिकता मर चुकी है। उसमें साहस नाम का लेसमात्र बचा भी नहीं है। वह अपनी पार्टी की नीतियों से एक कदम भी हिल-डुल नहीं सकता। उसके बाद भी दावे बड़े-बड़े करता है। कहता है कि इस समाज के लिए सब कुछ मैं ही करूंगा। वह जानता है कि अपने को ही ठगना आसान होता है और उसके आका उसे ऐसा ही करने के लिए ही अपनी जंजीरों में कैद किए हुए हैं।
जब समाज की आवश्यकता होती है, समाज कहीं आहत महसूस करता है तो अपनी पार्टी के खिलाफ खड़े होकर समाजहित में दो शब्द कहने की हिम्मत भी नहीं जुटा पाते हैं ऐसे लोग। यदि यह स्पष्ट रूप से यह बोले कि मेरे सम्बन्धित दल की फला नीतियां और विचारधाराओं के आधार पर आप साथ आएं, तो वह विश्वासघात नहीं होगा। किन्तु समाज के नाम पर, लोगों को जोड़ना और फिर दल का गुणगान करना समाज के लोगों को बेवकूफ बनाने जैसा होता है। राजनैतिक दलों की बात की जाए तो समाजवादी पार्टी ने विश्वकर्मा समाज को आहत किया था, लेकिन उससे जुड़े हुए नेता कभी भी ऐसा बयान देते हुए नहीं देखे गए कि हमारा समाज इस फैसले से आहत है। वैसे ही वर्तमान में भारतीय जनता पार्टी के द्वारा समय-समय पर विश्वकर्मा समाज की आस्था पर प्रहार किया जा रहा है। विश्वकर्मा समाज की सांस्कृतिक विरासत को नष्ट करने का कुचक्र रचा जा रहा है। सम्बन्धित नेतागण ऐसा एक भी बयान देते हुए नहीं पाए गए कि मैं उसका विरोध करता हूं जो समाज विरोधी है और समाज के साथ हूं। बहुजन समाज पार्टी भी सत्ता में रही और उसने विश्वकर्मा पूजा की छुट्टी कैंसिल करने का कार्य किया था, लेकिन उस समय भी बहुजन समाज पार्टी में नेता लोग विरोध करने से बचते रहे। यूं तो कांग्रेस का उत्तर प्रदेश में कोई विशेष अस्तित्व ही नहीं बचा है, जिससे कि कोई ऐसी तुलनात्मक बात की जाए। पूर्व में कांग्रेस ने विश्वकर्मा वंशियों से दो विधायक अवश्य दिए थे। और केन्द्रीय सत्ता की बात की जाए तो ज्ञानी जैल सिंह जैसा व्यक्ति राष्ट्रपति पद को भी सुशोभित कर चुके हैं। किंतु उस समय जातीय राजनीति इस तरह हावी नहीं थी तो उसे जातीय हिस्सेदारी के रूप में नहीं देखा जा सकता। भविष्य में क्या होगा यह भविष्य की कोख में है।
फिलहाल समाज के युवाओं और लोगों से आवाहन करूंगा कि सामाजिक एकता का परिचय दें। उस नेता के पीछे, समाज के नाम पर, समाज के लोगों को न फंसने दें जिसके गले में किसी पार्टी की नीतियों की रस्सी पड़ी हो, जो स्वयं ही किसी दल की नीतियों का गुलाम हो, वह समाज का शुभचिंतक हो ही नहीं सकता। वह तो केवल समाज को गुमराह कर अपने आका को खुश करने का प्रयास करता है। यहां यह ध्यान रखना होगा कि जब कभी ऐसे पार्टी गुलाम नेताओं को समाज की आवश्यकता हो, तो आप संख्या बल से उनका मनोबल अवश्य बढ़ा दें किंतु उनके आका नेता को यह अहसास भी दिलाते रहें कि समाज आपके इस पालतू नेता का गुलाम नहीं है। वह स्वतन्त्र रूप से निर्णय लेने की स्थिति में है। यदि आप या आपका यह नेता मेरे सम्मान के साथ खिलवाड़ करेगा, तो आपको उखाड़ फेंकने में समाज तनिक भी देरी नहीं करेगा। जब समाज इस स्थिति को प्राप्त होगा तो वह श्रेष्ठ से श्रेष्ठतम की ओर आगे बढ़ेगा।
आइए हम सब मिलकर सामाजिक एकता की नई गाथा लिखें और नेताओं को विचारधारा विशेष की नेतागिरी करने दें।

लेखक— अरविन्द विश्वकर्मा
(वरिष्ठ समाजसेवी एवं अध्यक्ष, राजनारायण सर्वजन उत्थान सेवा संस्थान, लखनऊ)
मो0: 9451151234

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