जल-थल-नभ की सारी काया, विश्वकर्मा भगवान की है माया

जल, थल, नभ की सारी संरचना भगवान विश्वकर्मा की देन है। भगवान विश्वकर्मा को सृष्टि का रचयिता कहा जाता है। इतना ही नहीं सभी देवी-देवताओं के अस्त्र-शस्त्र, महल आदि भगवान विश्वकर्मा की अलौकिक दिव्य कला से ही निर्मित हो प्राप्त हुये हैं। भगवान विश्वकर्मा ने हमेशा कुछ देने का ही काम किया है। जब भी देवलोक संकट में रहा उसे उबारने में भगवान विश्वकर्मा का बड़ा योगदान रहा है। भगवान विश्वकर्मा की महिमा का वर्णन सभी वेद-पुराण व धर्मग्रन्थों में मिलता है। वैसे तो भगवान विश्वकर्मा की महत्ता का वर्णन सहज नहीं है। एक लेखक व इतिहासकार के इस शब्द- ‘धरती के पास इतना बड़ा कागज नहीं, हिमालय के पास इतनी बड़ी कलम नहीं और समुद्र के पास इतनी स्याही नहीं कि भगवान विश्वकर्मा का वर्णन लिखा जा सके’ से भगवान विश्वकर्मा की महत्ता का आंकलन किया जा सकता है।
सभी देवी-देवताओं का एक युग रहा है परन्तु भगवान विश्वकर्मा का वर्णन सभी युगों में मिलता है। कोई भी धार्मिक ग्रन्थ बिना भगवान विश्वकर्मा के वर्णन के पूर्ण ही नहीं हुई। आधुनिक युग में भी भगवान विश्वकर्मा के वंशजों की कला लोगों को सराहने को मजबूर करती है। त्रेतायुग में भगवान राम को लंका जाने के लिये विश्वकर्मा वंशज नल-नील द्वारा समुद्र पर बनाया गया पुल ‘रामसेतु’ आज भी मौजूद है जिसे ‘सेतु समुद्रम’ के नाम से जाना जा रहा है। अजन्ता और एलोरा की गुफाएं विश्वकर्मा वंशजों की अलौकिक कला की निशानी है जिसे ‘अजूबा’ माना जाता है।
देवलोक के संकट में होने पर भगवान विश्वकर्मा ने योगदान दिया है तो भूलोक के संकट में होने पर भगवान विश्वकर्मा के वंशजों ने। देश की आजादी से लेकर विकास के हर राह को आसान करने में विश्वकर्मा वंशजों की बड़ी भूमिका रही है। फ्रांसीसी पर्यटक बर्नियर ने भारत प्रवास के दौरान 1857 के स्वाधीनता संग्राम का जिक्र करते हुये अपने मित्रों को पत्र लिखकर बताया है जिसमें जिक्र किया है- ‘‘युद्ध के लिये अस्त्र-शस्त्र बनाने वाले विश्वकर्मावंशियों के साथ बहुत ही अमानवीय अत्याचार हुये। असंख्य मारे गये, आत्महत्या कर लिये, शेष कार्य-कुशल कारीगरों को यूरोपीय देशों तथा समुद्री टापुओं पर छोड़ दिया गया। बर्नियर लिखता है कि भारतीय विश्वकर्मावंशी लोहार इतने कट्टर और स्वाभिमानी थे कि उनके द्वारा निर्मित ढाल, कटार, बर्छे और तलवारें अंग्रेजों के छक्के छुड़ा देते थे। विश्वकर्मावंशियों ने लड़ाई के लिये सिर्फ हथियार बनाये ही नहीं बल्कि अंग्रेजों से लड़े भी।’’ बर्नियर के इस पत्र लेख ने यह स्पष्ट कर दिया कि भगवान विश्वकर्मा के दिव्य शक्ति से निर्मित अस्त्र-शस्त्र से राक्षसों का बध हुआ तो उनके वंशजों ने मानवयुग में देश की रक्षा के लिये अंग्रेज राक्षसों का बध करने के लिये अस्त्र-शस्त्र बनाया।
—कमलेश प्रताप विश्वकर्मा

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