साजिशन छीन लिया अधिकार व सम्मान

पराधीनता की बेड़ियों से आजाद होने के बाद, हिन्दुस्तान का प्रत्येक नागरिक मान—सम्मान, स्वाभिमान के सपने देखने लगा। सभी को आशाएं थी कि अब कुछ बेहतर होगा, जीवन यापन की स्थितियां अनुकूल होगी। हमारी व्यवस्था हमारे लिए कार्य करेगी। ऐसी ही सोच को लेकर संविधान सभा ने संवैधानिक रूप से अधिकारों को देने का प्रयास किया। शिल्पकला के ज्ञाता शिल्पकार लोगों की आर्थिक, सामाजिक शैक्षिक हालत पराधीनता काल में बद से बदतर होती चली गई, क्योंकि इन्होंने ना मुस्लिमों की अधीनता स्वीकार कर धर्म परिवर्तन किया और ना ही अंग्रेजों की प्रत्यक्ष गुलामी की या चापलूसी।


लगभग समस्त विश्वकर्मा वंशीय शिल्पकर्म के माध्यम से अपना जीवन—यापन स्वाभिमान के साथ गुजारते रहे। डॉ0 भीमराव अम्बेडकर ने शिल्पकारों की स्थिति का बृहद आकलन कर यह देखा कि आर्थिक, सामाजिक शैक्षिक रूप से इन्हें सहयोग की आवश्यकता है, ताकि यह वर्ग आधुनिक भारत में सम्मान, स्वाभिमान व अधिकार के साथ आगे बढ़ सके। अतः इनकी भागीदारी सुनिश्चित हो इसलिए इस शिल्पकार वर्ग को अनुसूचित जाति की श्रेणी में रख कर इनकी समृद्धि का सपना देखा और उस शिल्पकार में 26 जातियों का समावेश कर दिया। किन्तु इस समाज के वह दुश्मन जो यह नहीं चाहते थे कि यह समाज आधुनिक भारत में विकास के पथ पर आगे बढ़ सके, उन्होंने इस आदेश की उन अन्तिम पंक्तियों को साजिशन विलुप्त करा दिया। सरकारें बदलती रही किन्तु इस समाज के उत्थान के लिए किसी ने भी ध्यान नहीं दिया।


उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव की सरकार बनने के बाद उन्होंने इस समाज की सांस्कृतिक विरासत के लिए विश्वकर्मा पूजा का एक अवकाश घोषित कर दिया। जो कि भाजपा की वर्तमान योगी सरकार की आंखों में चुभ रहा था और सत्ता पर आरूढ़ होते ही भगवान विश्वकर्मा के पूजन दिवस 17 सितम्बर की छुट्टी को योगी जी ने महापुरुष बतलाते हुए खारिज कर दिया। जिसके संबंध में तत्काल 28 अप्रैल 2017 को मैंने सरकार के समक्ष विरोध दर्ज कराते हुए अवकाश बहाली की मांग की। लगातार रिमाइन्डर भेजने के बाद अब 20 अगस्त 2018 सरकार द्वारा सूचित किया गया कि 2018 की अवकाश सूची घोषित होने व उच्च स्तर से कोई आदेश प्राप्त न होने के कारण प्रकरण में कार्यवाही का अवसर नहीं है। यूं तो सत्ता में भागीदारी इस समाज का केवल सपना है। आबादी के लिहाज से देखा जाए तो इनकी संख्या 10 प्रतिशत से ऊपर है और कर्मशील समाज कर्म पर विश्वास करता है। समय के साथ इनकी कारीगरी की सभी मान्य व्यवस्था उद्योग-धंधों के रूप में पूंजी पतियों के हाथ में चली गई। यह समाज वर्तमान में शहरों की ओर पलायन कर जीविका की खोज करता हुआ दिखता है। जिसे कि मध्यमवर्गीय के रूप में चयनित किया जा सकता है अन्यथा गांवों में रहने वाले लोग विषम परिस्थितियों में हैं।
राजनीतिक लालसा का न होना और क्षेत्रीय स्तर पर अलग-अलग टाइटिल से संख्याबल न दिखना नेताओं का काम आसान करता है। जिसकी वजह से उचित मान—सम्मान नहीं मिल रहा है और बराबर स्वाभिमान पर चोट हो रही है। यूं तो कहा जा सकता है कि उत्तर प्रदेश में राम आसरे विश्वकर्मा, मुलायम सिंह यादव सरकार में मन्त्री के रूप में आसीन थे किन्तु एक सच यह भी है कि अखिलेश यादव सरकार में इन्हें केवल पिछड़ा वर्ग आयोग का अध्यक्ष बनाकर समाज का अपमान किया गया। राम आसरे विश्वकर्मा सपा में होकर भी उसमें कुछ अन्य विश्वकर्मा वंशियों को आगे न बढ़ा सके और स्वयं गिड़गिड़ाते रहे, जिसका कारण सिर्फ और सिर्फ उनके द्वारा समाजहित से मुंह मोड़ लेना था। अखिलेश यादव सरकार में उन्हें कम महत्व देना भी इसी के आसपास दिखलाता है, किन्तु जिम्मेदारी सपा के जिम्मेदारों की थी कि वह समाज के हित के लिए अन्य को आगे बढ़ाते।
भाजपा के सिद्धांत सबका साथ—सबका विकास से प्रेरित होकर समाज के लोगों ने एक साथ होकर भाजपा के लिए सर्वस्व न्योछावर किया, किन्तु वास्तविकता यह है कि योगी जी आसीन होते ही गाल पर ऐसा तमाचा मारे कि यह समाज स्वयं को ठगा महसूस करने लगा। सम्मान को ठेस योगी जी ने पहुंचाया और यदि अधिकारों की बात की जाए तो आजादी से अब तक अलग-अलग लोगों ने अपना सर्वोत्तम प्रयास किया किन्तु उन्हें सफलता नहीं मिल पाई। इसके लिए दोषी कहीं न कहीं सड़क छाप नेता और अज्ञानी कथित रूप से वे विश्वकर्मा वंशीय हैं जो विकास, अधिकार व स्वाभिमान को छोड़कर पिछलग्गू बनने पर आमादा हैं। अब समय आ गया है, पढ़ी-लिखी युवा पीढ़ी को यह समझना होगा कि सबका विकास कैसे हो सकता है? और दोषी कौन है? उसे अधिकार व सम्मान से खेलने वाले स्वार्थी लोगों को सबक सिखाना ही होगा। समाज की बेहतरी कैसे संभव है उसे लोगों को बतलाना भी होगा और अधिकार छीनने की उस परम्परा का निर्वहन करना होगा जो अन्य समाज के लोग करते रहे हैं।
धन्यवाद, जय श्री विश्वकर्मा

लेखक— अरविन्द विश्वकर्मा, लखनऊ

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