अति पिछड़ों के साथ ‘‘सामाजिक न्याय’’ का सवाल

देश में ब्राह्मणवाद का विरोध कई दशकों से होता रहा है। विरोधियों ने राष्ट्रपति एवं प्रधानमंत्री पद तक को निशाने पर रखा था। कैबिनेट सचिवालय से लेकर देश की ब्यूरोक्रेसी तक के आंकड़े एकत्रित कर ब्राह्मणवाद के विरोधियों ने देश के सामने रखा तथा ‘‘सवर्णवाद’’ का वर्चस्व समाप्त कराने के इरादे से मण्डलवाद को अस्तित्व में लाया गया। ब्राह्मणवाद तो आजादी के चार दशक के शासन के बाद पैदा हुआ था किन्तु मण्डलवाद के पन्द्रह वर्षों के ही अंतराल में यादव एवं कुर्मी के रूप में एक नया ब्राह्मणवाद उ0प्र0 में पैदा हो गया जो कि एक दशक में और भी भयानक रूप लेने वाला है।
सन् 1978 में मण्डल ने सर्वेक्षण के दौरान उ0प्र0 की लगभग पिछड़ी जातियों (जो उ0प्र0 की कुल अबादी का लगभग एक तिहाई था) को पिछड़े वर्ग की सूची में रखकर इन्हें 27 प्रतिशत आरक्षण दिये जाने का प्रावधान किया था। यद्यपि उ0प्र0 में 1977 से ही 15 प्रतिशत आरक्षण पिछड़ी जातियों का दिया जा चुका था तथा 13 वर्षों  तक इस आरक्षण का लाभ उ0प्र0 में पिछड़ी जातियों का नेतृत्व करने वालों को ही मिला था। खासकर पुलिस, पी0ए0सी0 में यादव एवं कुर्मियों का ही वर्चस्व रहा। इनकी संख्या (यादव व कुर्मी) पिछड़ी जातियों की कुल संख्या का एक चैथाई ही था। पिछड़े समुदाय के तीन चैथाई लोगों को आरक्षण का लाभ मण्डल से पहले इसलिए नहीं मिल पा रहा था कि इन जातियों का राजनैतिक नेतृत्व उ0प्र0 में न के बराबर रहा। किन्तु 90 के दशक के बाद में भी तीन चैथाई अति पिछड़ी जातियों को भागीदारी इसलिए नहीं मिल पाई कि इनका राजनैतिक नेतृत्व शून्य था।
सन् 1990 मेें मण्डल की सिफारिश लागू होने के बाद भी उ0प्र0 मण्डल का सारा लाभ इन्हीं दो जातियों (यादव व कुर्मी) तक सीमित रहा जिनका राजनैतिक नेतृत्व 90 के दशक से आज तक है। उ0प्र0 में आपातकाल के बाद सन् 1977 से 2017 के 40 वर्षों में से (सन् 1980 से 1989 तक) दस वर्षों के कांग्रेस शासन को छोड़कर 30 वर्षों में जब भी विपक्षी दलों की सरकार रही तब प्रदेश का मुखिया तथा कैबिनेट के अधिकांश सदस्य पिछड़ी जाति (यादव एवं कुर्मी) अथवा दलित समाज के ही थे।
सन् 1977-78 में पिछड़ी जाति के ही राम नरेश यादव एवं बनारसी दास गुप्ता (जो मण्डल की सूची में है) का नेतृत्व रहा। सन् 1989 में जनता दल की सरकार बनी तो नेतृत्व मुलायम सिंह यादव का था। उनकी कैबिनेट में तीन चैथाई सदस्य यादव व कुर्मी समुदाय के ही थे।
यहाँ तक कि रामलहर में सन् 1991 में जब भाजपा सरकार बनी तब भी पिछड़ी जाति के कल्याण सिंह (लोध) प्रदेश के मुखिया बने। उनकी कैबिनेट में भी कुर्मी जाति का वर्चस्व रहा, 4 यादव भी कैबिनेट में थे। सन् 1993 में बसपा के सहयोग से मुलायम सिंह यादव ने दुबारा नेतृत्व संभाला तब भी यादव एवं कुर्मी समुदाय का ही वर्चस्व उनकी कैबिनेट में था। मायावती ने गेस्ट हाउस काण्ड के बाद 3 जून,1995 को जब सत्ता संभाली तब उन्होंने भी भाजपा के पिछड़ी जाति के कुर्मी एवं यादवों को मंत्रिमण्डल में शामिल करना पड़ा जिससे इनका वर्चस्व बरकरार रहा।
सन् 1996 के चुनाव के बाद जब कांग्रेस को तोड़कर भाजपा की सरकार बनी तब भी पिछड़ी जाति के कल्याण सिंह (लोध) ही मुख्यमंत्री बनाये गये। उनकी सरकार में भी यादव एवं कुर्मी समुदाय का ही पूर्ण वर्चस्व रहा। उनके बाद भाजपा की राम प्रकाश गुप्ता की सरकार ने तो हद कर दी, इस सरकार द्वारा जाट जैसी सामन्त जाति को ही पिछड़ी जाति में शामिल कर दिया। इनके मंत्रिमण्डल में भी कुर्मी एवं यादव का वर्चस्व था। डेढ़ वर्ष के राजनाथ सिंह के कार्यकाल में भी यादव एवं कुर्मी का वर्चस्व कायम रहा। सन् 2002 में भाजपा के सहयोग से मायावती ने जब दुबारा सत्ता संभाली तो उनकी कैबिनेट में भी कुर्मी एवं यादव का ही वर्चस्व बना रहा।
माह अगस्त, 2003 में जब मुलायम सिंह की सरकार कांग्रेस ने समर्थन देकर बनवा दी तब तो क्या कहना था। पूरे प्रदेश में यादव राज कायम हो गया। अधिकांश डी0एम0, एस0पी0 एवं जिला स्तर के अन्य अधिकारी यादव समुदाय के ही बना दिये गये। पुलिस में थानाध्यक्ष स्तर से पुलिस अधीक्षक पद पर यादव ही तैनात किये गये। सरकारी भर्तियों में यादव और कुर्मी का प्रतिशत 80 से 90 तक हो गया, जब कि सन् 2001 के सरकारी आंकड़ों के मुताबिक यादव-कुर्मी प्रथम श्रेणी की नौकरी में 35 प्रतिशत, द्वितीय श्रेणी की नौकरियों में 64 प्रतिशत तृतीय श्रेणी की नौकरियों में 56 प्रतिशत तथा चतुर्थ श्रेणी नौकरियों में 41 प्रतिशत था। किन्तु सन् 2003 में मुलायम सिंह यादव के सत्तारूढ़ होने के बाद किये गये तीन लाख सरकारी भर्तियों में इनका प्रतिशत एकाएक बढ़ गया। ये भर्तियाँ शिक्षा मित्र, बी0टी0सी0, बी0एड0, पुलिस, पी0ए0सी0, भूमि सैनिक एवं आंगनबाड़ी कर्मियों के रूप में की गयी थी।
चूॅकि 20 वर्षों के विपक्षी दलों के कार्यकाल में 30 वर्षों तक पिछड़ों दलित समुदाय का ही नेतृत्व प्रदेश को मिला इसलिए मण्डल के तहत होने वाली भर्तियों का सारा लाभ यादव व कुर्मियों को ही मिला। कुछ ही लाभ लोध समुदाय को भी मिल पाया।
मुलायम सिंह यादव ने पिछड़ी जाति का वर्चस्व उ0प्र0 की राजनीति में बढ़ाने के लिये 25 अन्य जातियों को (जिनकी आबादी 10 प्रतिशत है) भी पिछड़़ी जाति की सूची में सम्मिलित करा दिया, किन्तु मण्डल के तहत जब नौकरियाँ देने की बात आयी तब केवल यादव, कुर्मी समुदाय तक ही सीमित रहा। सन् 2001 में कराये गये सर्वेक्षण के अनुसार पिछड़ी जातियों का एक चैथाई हिस्सा रहे यादव-कुर्मी तीन चैथाई सरकारी पदों पर काबिज थे, जब कि पिछड़े समुदाय के तीन चैथाई लोगों को मात्र एक चैथाई पदों से ही संतोष करना पड़ा।
तीसरी बार मुलायम सिंह यादव के मुख्यमंत्री बनने के बाद यादव-कुर्मी 90 प्रतिशत तक सरकारी पदों पर काबिज हो गये। चूँकि राजनीतिक नेतृत्व यादव व कुर्मियों का ही अधिकांश वर्षों तक रहा इसलिए मण्डल का लाभ भी इन्हीं दो जातियों तक रह गया। सरकारी नौकरियों में ही नहीं उ0प्र0 के 52,000 ग्राम पंचायतों में से पिछड़ी जाति के लिए 27 प्रतिशत (14,040) आरक्षित ग्राम पंचायतों तथा इतने ही बी0डी0सी0 सदस्य पदों में भी तीन चैथाई पदों पर यादव, कुर्मी का कब्जा हो चुका है, जब कि अति पिछड़ी जाति के तीन चौथाई समुदाय के हिस्से में एक चौथाई से भी कम हाथ लगे हैं।
यही नहीं, उत्तर प्रदेश में सन् 2007 में जब मायावती मुख्यमंत्री बनी तब अति पिछड़ी जातियों का प्रतिनिधित्व गौण ही रहा, कुछ एक पिछड़ी जातियों से नेता पाले गये जो मायावती के दरबारी नेता बनकर रह गये। उच्च पिछड़ी जातियों के नेताओं ने अति पिछड़ी जातियों के अधिकारों को डकारना छोड़ा नहीं। अति पिछड़ी जातियों के वेतनभोगी नेता मूक दर्शक बने रहे। कुर्मी, यादव, जाट का सरकारी नौकरियों में 80-90 प्रतिशत लगभग भागीदारी पहॅुच गयी। मायावती का खुल्लम-खुल्ला खेल देखकर अति पिछड़ों ने पुनः मुलायम सिंह यादव पर भरोसा जताया। उत्तर प्रदेश में सन् 2012 के विधानसभा के आम चुनाव में 40.5 प्रतिशत आबादी में से केवल 3 से 4 प्रतिशत अति पिछड़ी जातियों ने समाजवादी पार्टी की साइकिल को धक्का दिया तो समाजवादी पार्टी का वोट प्रतिशत 29.15 प्रतिशत पहुॅच गया जिससे सपा को 224 सीटें हासिल हुई। 3 से 4 प्रतिशत वोट एमबीसी का बसपा से निकलने के कारण बसपा का सन् 1996 की तरह वापसी हो गयी और केवल 80 सीटें ही हासिल कर पायी।
सन् 2012 की अखिलेश यादव की सरकार में अति पिछड़ी जातियाँ हाशिये पर रही। लगभग 2 दर्जन यादव कैबिनेट व राज्यमंत्री बनाये गये थे। यादव व कुर्मी जातियों का दबदबा अखिलेश यादव की सरकार में साफ झलक रहा था। जैसे- यादव के नाम पर पूरे उत्तर प्रदेश में ही समाज पिछड़ी जाति का है।
अखिलेश यादव की सरकार में अति पिछड़ी जातियों का कोई वजूद रहा नहीं। एक चमचा छोड़ अति पिछड़ी जाति से कोई कैबिनेट मंत्री नहीं था। अगड़ी मुस्लिम जातियों का वर्चस्व तेजी से बढ़ा जो समाजवाद के नाम है लेकिन पसमांदा पिछड़ी मुस्लिम जातियों को कुछ हासिल हुआ यह प्रश्न चिन्ह है।
केन्द्र और उत्तर प्रदेश की भाजपा सरकार अति पिछड़ी जातियो की 40.5 प्रतिशत आबादी के लिए क्या कुछ सकती है? ऐसा नहीं लगता, क्योंकि उच्च पिछड़ी जातियों (यादव, कुर्मी, जाट) का नेतृत्व केन्द्र में भाजपा की डोली उठाने वाले कहार की भूमिका में कार्य कर रहा है। इससे साफ जाहिर हो रहा है कि भाजपा से कोई उम्मीद क्यों करें?
इतना ही नहीं, उ0प्र0 के ग्राम पंचायतों के 2015 के आम चुनाव में पिछड़ी जाति के लिए लगभग चौदह हजार आरक्षित ग्राम प्रधान पदों पर 80 प्रतिशत से 90 प्रतिशत तक यादव-कुर्मी काबिज हो गये तथा आरक्षित पदों पर भी पांच से सात हजार ग्राम प्रधान पदों पर भी यादव-कुर्मी काबिज हैं। क्योंकि आरक्षण में इस कदर धोखाधड़ी की गई है कि जहां दो प्रतिशत आबादी इस जाति की थी वह ग्रामसभा भी पिछड़ों के लिए आरक्षित कर दिया गया। जहां इनका बहुमत है, वहाॅ तो इनकी जाति के ग्राम प्रधान का चुना जाना सुनिश्चित ही रहा वहां चाहे आरक्षण हो चाहे न हो। इस प्रकार 52000 में से 20000 ग्राम पंचायतों पर सपा का कब्जा हुआ, जो 38 प्रतिशत होता है। फिर भी सपा को चुनौती देना कठिन काम नहीं है।
फिलहाल उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार में अति पिछड़ों को मुख्यमंत्री आदित्यनाथ के मजबूत इरादों से उम्मीद जगने के साथ एमबीसी जातियों में योगी के प्रति संवेदनशील उपज रही है। परन्तु योगी, राजनाथ सिंह की पूर्ववर्ती भाजपा सरकार की सामाजिक न्याय समिति के परिप्रेक्ष्य में नई कमेटी बनाकर अति पिछड़ों का आरक्षण देने की बात ‘‘भाजपा द्वारा बार-बार काठ की हाॅडी’’ में खिचड़ी पकाने जैसा है। यदि मुख्यमंत्री योगी वास्तव में एमसीबी के प्रति संवेदनशील होकर सीधे ‘‘कर्पूरी ठाकुर फार्मूले को अथवा मण्डल कमीशन के एल0आर0 नायक की संस्तुति लागू कर देते हैं तो निश्चित ही उत्तर प्रदेश में योगी अति पिछड़ों के ‘‘युग सूर्य’’ बनकर सदियों के लिये वन्दनीय होंगे अथवा परम्परागत रूप से निन्दनीय नेता बनकर रह जायेंगे।‘‘
इन परिस्थितियों में उत्तर प्रदेश में मण्डलवाद से उत्पन्न नव ब्राह्मणवाद का वर्चस्व खत्म करके पिछड़ी जातियों के तीन चौथाई समुदाय वाले अति पिछड़ी जातियों को ‘‘सामाजिक न्याय’’ दिलाने के लिए आवश्यक है कि 27 प्रतिशत (14040) आरक्षित ग्राम पंचायतों में तीन चौथाई (10530) पंचायतों पर तीन चौथाई अति पिछड़ी जातियों के समुदाय का कब्जा हो तथा एक चौथाई यादव कुर्मी को पिछड़ी जाति के लिए आरक्षित 14040 ग्राम पंचायतों से मात्र एक चौथाई (3510) पदों तक सीमित रखा जाए। इसी प्रकार सरकारी नौकरियों में जब तक तीन चौथाई अति पिछड़ी जातियों के समुदाय को तीन चौथाई पद न मिल जाए तब तक यादव-कुर्मी की सरकारी पदों पर भर्तियां रोक दी जाए।
इस प्रकार वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में बदलाव लाकर समता का शासन उत्तर प्रदेश में स्थापित किया जा सके ताकि सभी जातियों एवं समुदायों को न्याय एवं सम्मान मिल सके। यह कार्य अम्बेडकर से भी बड़ा है, क्योंकि उन्होंने 21 प्रतिशत अनुसूचित जातियों का आरक्षण दिलाया था जबकि अति पिछड़ी जातियों की उत्तर प्रदेश में आबादी 40.5 प्रतिशत है। इसी प्रकार बिहार, उड़ीसा, कर्नाटक, राजस्थान, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश सहित अन्य राज्यों में भी पिछड़ी जातियों (जिनकी आबादी 20 से 30 प्रतिशत) को न्याय दिलाने की प्रक्रिया शुरू की जा सकती है। यह प्रक्रिया मण्डल के कारण उत्पन्न नव ब्राह्मणवाद का वर्चस्व खत्म करके सामाजिक समरसता एवं सभी अति पिछड़ी जातियों के आर्थिक विकास में सहायक होगी।
-डॉ0 राम सुमिरन विश्वकर्मा
मो0- 7376720797, 9506263744
(लेखक- मोस्ट वैकवर्ड क्लासेज एसोसिएशन, उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष हैं)

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