साठ प्रतिशत दिव्यांगता भी नहीं रोक पाई आरती की सफलता की राह

पटना (सतीश कुमार शर्मा)। कहते हैं कि सफलता बिन बुलाए मेहमान की तरह कभी नहीं आती है, बल्कि उसे अपनी लगन और अथक परिश्रम से आने के लिए मजबूर करना पड़ता है। इसका जीता—जागता उदाहरण आरती कुमारी हैं जो दोनों पैर से 60 प्रतिशत से भी अधिक दिव्यांग व शादी-शुदा होने के बावजूद अपनी पढ़ाई जारी रखी और अपने घर-परिवार को संभालते हुए अपनी कड़ी मेहनत और लगनशीलता के बल पर इंटरमीडिएट स्तरीय DCECE[PM/PMD]-2017 की परीक्षा में बाजी मारी।
आरती बताती हैं, पहले दो बार असफलता का भी सामना करना पड़ा। लेकिन हिम्मत नहीं हारी और तीसरी बार सफलता हासिल कर ही लिया। लेकिन आगे एक बार फिर से निराश होना पडा क्योंकि अपने वर्ग में अच्छे रैंक-23 आने के कारण पैरा मेडिकल (इंटरमीडिएट स्तरीय) PM (Staff Grade-A Nursing/A.N.M. Nursing के लिए प्रथम काउंसलिंग की प्रथम दिन ही बुलाया गया था। लेकिन गांव में न्यूज़ पेपर/इंटरनेट नहीं होने के कारण सही समय पर सूचना नहीं मिली। जिसके वजह से पहली काउंसलिंग छूट गयी। लेकिन दूसरी काउंसलिंग में फिर से इनका चयन हुआ और GRADE-A NURSE, कोर्स P.M.G के लिए G.N.M School, शेखपुरा (बिहार) कॉलेज में दाखिल मिला गया।
आरती अपने परिवार के बारे में बताती हैं “मेरी पढ़ाई अपनी ही गांव-धरहरा, थाना-बेलागंज, जिला-गया (बिहार) के सरकारी स्कूल से ही शुरू हुई। पिता (यदुनंदन विश्वकर्मा, जाति-लोहार) एक साधारण किसान हैं, लेकिन शिक्षा के प्रति बहुत जागरूक हैं। अपने सभी कामो में सबसे पहले शिक्षा को महत्व देते हैं। वह कभी भी हमारे भाइयों-बहनों को शिक्षा पर खर्च और समय देने से पीछे नहीं हटे बल्कि सबसे आगे रहे। कभी भी बेटा और बेटी में कोई भेद—भाव नहीं रखे, सबको एक समान शिक्षा दिये। अन्य परीक्षा और पैरा मेडिकल का फॉर्म भरने से लेकर नामांकन प्रक्रिया तक हमेशा साथ दिये। मेरी मां की भी काफी अहम भूमिका रही है।
आरती ने बताया कि वह पांच भाई-बहन में सबसे छोटी है। सबसे बड़ी दीदी- अनु शर्मा, अंजू शर्मा, और बड़े भाई- पवन शर्मा (भारतीय रेल सेवारत), श्रवण शर्मा (राज्य सेवारत) हैं। कहा, जब हम लोग घर पर पढ़ते थे तो मां प्रतिदिन सुबह चार बजे ही जगाकर पढ़ने बैठा देती थी और खुद जगकर वहीं बैठी रहती थी। अगर गलती से भी नींद की झपकी आई तो फिर खैर नहीं, डांट और पिटाई शुरू। मां जितना पढ़ाई के मामले में कड़ाई करती हैं उससे कहीं ज्यादा हम लोगों से प्रेम भी करती हैं।”
आरती की शादी उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के दौलतपुर गांव में हुई है। अपने ससुराल वालों के बारे में बताती हैं- अक्सर शादी होने के बाद लड़कियां पढ़ाई छोड़ देती हैं या ससुराल वाले रोक देते हैं लेकिन मेरे साथ ऐसा नहीं हुआ। जब मैं अपनी पति (रामलखन शर्मा) और सासु मां के सामने आगे भी पढ़ाई का प्रस्ताव रखी तो उन लोगों को काफी खुशी हुई। सासु मां तो अपनी बेटी जैसा मानती और व्यवहार करती हैं। वह कहती हैं “तुम सिर्फ बहू ही नहीं, मेरी बेटी भी हो। जब तक मैं हूं तुम्हें अपनी मां की कमी महसूस नहीं होने देंगे। तुम जब भी अपने आप को पाओगी तो ममता के छाव में ही।” आरती को ससुराल वालों से भी बहुत सहयोग मिला।
नर्सिंग में जाने का उद्देश्य पूछने पर आरती बताती है- “मैं दोनों पैर से दिव्यांग होने के कारण जीवन में बहुत सी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। चलने में व अन्य काम में काफी कठिनाई होती है। फिर भी अपना काम खुद करती हूं। जिससे लोगों के दुःख को समझ सकती हूं इसलिए मैं दुखियों और रोगियों को सेवा देना चाहती हूं।” इस सफलता और सोच पर आज दोनों परिवार काफी खुश हैं। सफलता और ऐसी सकारात्मक सोच रखने के लिए पूरे विश्वकर्मा परिवार की तरफ से बहुत बहुत बधाई। आरती पर पूरे विश्वकर्मा परिवार को गर्व है। मैं आरती के माता-पिता को कोटि-कोटि तहे दिल से प्रणाम करता हूं।

लेखक का संदेश:-
★ हर बच्चे में एक चिंगारी होती है, उसे आग बनने के लिए सिर्फ थोड़ी सी हवा की जरूरत होती है। कौन जानता था आरती कल तक खुद की जिंदगी से पीड़ा सहने वाली आज दूसरे की पीड़ा हरने वाली बनेगी।
★ हर माता-पिता अपने सभी कामों में अपने बच्चे के शिक्षा-दीक्षा की प्रथम प्राथमिकता दें। उसके साथ कुछ समय दें, बाते करें, उसे क्या बनना है सुनें और सहयोग करें।
★ बेटा-बेटी में कोई भेदभाव नहीं रखें। दोनों को शिक्षा-दीक्षा और हर साधन-सुविधा एक समान दें।
★ रूढ़िवादी कुरीतियों (बहू पर हुक्म चलना, दहेज के लिए प्रताड़ित और व्यंग करते रहना, चारदीवारी के अंदर बंद करके रखना) को त्याग कर बहू को अपनी बेटी जैसा मानें, क्योंकि बेटी की कोई निश्चित रूप नहीं। जिस रूप में देखें वही नजर आयेगी। आपकी बेटी भी किसी की बहू है या बनेगी। उसके साथ भी ऐसा व्यवहार हो सकता है।


-सतीश कुमार शर्मा, पटना
E—mail: [email protected]

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