आजादी की लड़ाई में विश्वकर्मावंश की कुर्बानियां कम नहीं

1857 के स्वाधीनता संग्राम को अग्रेंजो द्वारा इस समर को मामूली घटना बताने मे मेटकाप की रिपोर्ट को इतना प्रचारित किया कि कार्लमाक्र्स सरीखे वामपंथी विचारक भी अंग्रेजों के झांसे मे आ गये। फ्रांसीसी पर्यटन बर्नियर ने भारत प्रवास के दौरान अपने कुछ मित्रों को पत्र लिखा, जिसे उसके मित्रो ने पुस्तक की शक्ल दे दी।
कालांतर में उसके पत्रों को ही भारत का अधिकृत स्वरूप मान लिया गया। बर्नियर एक अति भावुक और मौजीकिस्म का व्यकित था। उसने सामन्तो का जो स्वरूप देखा, उस आधार पर वर्णन कर दिया। यह आधी-अधूरी जानकारी थी। यूरोप में इसके अलावा मोरलैण्ड और पादरियों के जरिये भारत की विकृत तस्वीर पहुंची जो भारतीयों को सभ्य बनाने के लिए उन्हें इसाई बनाना चाहते हैं। युद्ध के लिए अस्त्र-शस्त्र बनाने वाले भारतीय ‘लोहारों’ के साथ बहुत ही अमानवीय अत्याचार हुए। असंख्य मारे गये, आत्महत्या कर लिये, शेष कार्य कुशल कारीगरों को यूरोपीय देशों तथा समुद्री टापुओं पर जबरन छोड़ा गया। बर्नियर लिखता है कि ये आर्टिजन्स (ब्लैकस्मिथ) ‘‘भारतीय मनुवंशी लोहार इतने कट्टर और स्वाभिमानी थे कि उनके द्वारा निर्मित ढाल, कटार, बर्झे और तलवारें अंग्रेजों के छक्के छुड़ा देते थे।’’ सेनानायक बर्टियर के अनुसार उन्होंने तात्याटोपे, झांसी की रानी तथा अन्य योद्धाओं को जो अस्त्र-शस्त्र बनाकर दिये उसके आगे अंग्रेज सेैनिक टिक नहीं पाते थे। इनकी जगह-जगह कार्यशालायें थीं। इनकी एक टोली थी जो योद्धाओ को युद्ध स्थल में शस्त्र आपूर्ति एवं मरम्मत का कार्य करते थे तथा जरूरत पड़ने पर स्वयं लड़ाई लड़ते थे। ये लोग अस्त्र-शस्त्र निर्माण के साथ यु़द्ध कौशल में भी निपुण थे।
भारत में इतिहास लेखन की परम्परा का अभाव रहा है। कथाओं ओैर महाकाव्यों के जरिये यहां इतिहास रचा गया। भारतीय शिल्पियों का कोई इतिहास नहीं लिखा गया जबकि उनके द्वारा निर्मित दुर्ग, किला, तोप, बन्दूकें, स्तम्भ, शिलालेख, राज भाव आदि के अवशेष इसके चश्मदीद गवाह हैं। इसी प्रकार 1857 का कोई इतिहास हमारे यहां नहीं है। उन्होंने न केवल भारतीयों को इस पर लिखने की पाबन्दी लगा दी थी वरन् शस्त्र निर्माताओं ओैर योद्धाओं के नामों पर अपनी संतानों के नाम रखने पर रोक लगा दी थी। अंग्रेजों ने इस विद्रोह को कुचलने के लिए जो पुशता दिखाई, वह खुद मेटकाफ की थ्योरी का खण्डन करने को काफी है। स्वतंत्रता समर के संघर्ष में वतन पर न्यौछावर होने वाले अस्त्र-शस्त्र निर्माता हजारों विश्वकर्मा कारीगर थे, जिनको अंग्रेजों ने फांसी के फन्दों पर लटका दिया था परन्तु उन्होंने विदेशी हुकूमत के सामने आत्मसमर्पण नहीं किया।
इसी क्रम में ”दि म्यूटिनी“, में प्रवीजिनल सिविल कमिश्नर सर जार्ज केम्वेल ने बड़ी बेवाकी के साथ इस घटनाक्रम का उल्लेख किया है। लिखा, मैं जानता हॅू कि बड़ी बेदर्दी के साथ कत्लेआम किया गया। वास्तविकता यह है कि अंग्रेजों ने वह काम किये हैं जो कत्लेआम से भी भयंकर थे।’’ हैव्वाक की सेना के अधिकारी द्वारा ब्रिटेन भेजे गये पत्र के मुताबिक हमें याद रखना चाहिये कि जिन लोगों को कठोर यातना, देश निष्कासन, फांसी दी गयी वे कोई सशस्त्र बागी नहीं, निरीह नागरिक थे जिन्हें संदेह के आधार पर पकड़ने के बाद कठोर अमानवीय दण्ड दिया गया। इनमें अधिकांश शस्त्र निर्माता ब्लैकस्मिथ (लोहार) थे।
—गुरूराम विश्वकर्मा ‘मधुकर’ गाजीपुर

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