…लगा 19वां साल

आप सभी के स्नेह, आशिर्वाद और सहयोग से ‘‘विश्वकर्मा किरण’’ प्रकाशन के 18 वर्ष कैसे बीत गये, पता ही नहीं चला। इस अवधि में कितने उतार-चढ़ाव देखने को मिले इसका अन्दाजा सहज नहीं लगाया जा सकता। एक तरफ आप सभी का सहयोग था तो दूसरी तरफ प्रकाशन परिवार का संघर्ष। सहयोग और संघर्ष ने मिलकर नये आयाम स्थापित करते हुये इतनी ऊंचाई प्रदान की, जिसकी वजह से ‘‘विश्वकर्मा किरण’’ प्रकाशन को आज देश के साथ ही विश्व के अधिकांश हिस्सों में भी पहचान मिली हुई है। 18 वर्ष की अवधि व्यक्ति के जीवनकाल में बहुत महत्वपूर्ण होती है। इसे जीवन का वह क्षण माना जाता है जब व्यक्ति अपना लक्ष्य तय करते हुये उसी तरफ अग्रसर होता है। अब, जबकि प्रकाशन का 19वां वर्ष प्रारम्भ हो चुका है, तो निश्चित ही प्रकाशन परिवार का लक्ष्य सभी के सम्मुख होना चाहिये और उस तरफ अग्रसर होना चाहिये। वैसे तो प्रकाशन परिवार ने लक्ष्य उसी समय निर्धारित कर लिया था जब 18 वर्ष पूर्व प्रकाशन शुरू हुआ था। परन्तु किन्हीं कमजोरियों के कारण कदम लड़खड़ाते रहे जिसकी वजह से लक्ष्य प्राप्ति से अभी तक दूरी बनी हुई है।
‘‘विश्वकर्मा किरण’’ प्रकाशन का लक्ष्य है देश के कोने-कोने में पत्रिका के माध्यम से ‘विश्वकर्मावंश’ के लोगों के दिलो-दिमाग में सामाजिक एकता और विकास के लिये वैचारिक क्रान्ति का समावेश करना। वैचारिक क्रान्ति ही एक ऐसी ताकत है जो समाज को एकसूत्र में पिरो सकती है। इसी वैचारिक क्रान्ति ने देश की आजादी में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी जो कागज के पन्नों पर समाचार के रूप में हाथो-हाथ लोगों तक पहुंचती रही। इसी को ‘सूचना क्रान्ति’ के रूप में जाना जाता है। सूचना क्रान्ति से ही वैचारिक क्रान्ति आती है। जिस समाज या वर्ग के अन्दर वैचारिक क्रान्ति आ जाती है, उस वर्ग या समाज में एकता की लौ अपने आप जल जाती है। ताजा उदाहरण के रूप में अन्ना हजारे का आन्दोलन भी ‘वैचारिक क्रान्ति’ के रूप में जाना जाता है, जहां रातो-रात लाखों लोग दिल्ली के रामलीला मैदान में इकट्ठा हो गये।
‘‘विश्वकर्मा किरण’’ प्रकाशन परिवार ने इस संकल्प के साथ प्रकाशन शुरू किया था कि समाज के वरिष्ठ लोगों, लेखकों, साहित्यकारों व बुद्धिजीवियों के सहयोग से विश्वकर्मावंश के लोगों में सूचना क्रान्ति के रास्ते वैचारिक क्रान्ति का समावेश कर एकता व विकास का मार्ग प्रशस्त किया जायेगा। प्रकाशन परिवार ने पिछले 18 वर्ष में जो संघर्ष किया है वह अकल्पनीय है। एक सच्चाई यह भी है कि सहयोग की अपेक्षा संघर्ष ज्यादा रहा है, सहयोग के अभाव में ही आशातीत सफलता नहीं मिली। पूरी तरीके से युवा उम्र के इस प्रकाशन का संघर्ष इस अपेक्षा के साथ जारी है कि भविष्य में सहयोग की कमी नहीं होगी। प्रकाशन का डिजिटल संस्करण भी http://vishwakarmakiran.com/ पर उपलब्ध है।

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